बेटा हुआ तीस पार, दुल्हन दिला दो परवरदिगार

पंजाब के गांवों में 30 साल से ज्यादा उम्र के कुंवारे युवकों की शादी चिंता का विषय बनी, कई माताएं स्वर्ण मंदिर में अरदास कर रही हैं।

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चंडीगढ़ : पंजाब के गांवों में बड़ी संख्या में ऐसी माताएं अपने कुंवारे बेटों की शादी के लिए स्वर्ण मंदिर जाकर अरदास कर रही हैं जिनकी शादी की आम उम्र निकल चुकी है। इन गांवों में 30 साल से ज्यादा उम्र के काफी युवकों को दुल्हनें नहीं मिल पा रही हैं, जोकि चिंताजनक है। स्वर्ण मंदिर कॉम्प्लेक्स में सेवा करने वाले एक ग्रंथी ने बताया कि अरदास के लिए उनके पास आने वाली कई माताएं 30 से 40 साल के अपने बेटों की शादी को लेकर चिंतित रहती हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ श्रद्धालुओं की अरदास में भी बदलाव आया है। ग्रंथी ने कहा,’कुछ साल पहले, लोग अक्सर अपनी बेटियों और बहुओं के विदेश जाने के लिए वीज़ा की प्रार्थना करते थे। अब, ज्यादातर अरदासें बेटियों या बहुओं को कनाडा या दूसरे देशों में नौकरी और पीआर मिलने के लिए होती हैं।’ उन्होंने कहा कि यह मामला अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज के संज्ञान में भी आया है। पंजाब के गांवों में इसे एक बढ़ती सामाजिक चिंता मानते हुए वे लोगों से आगे आने और योग्य युवकों की शादी कराने में मदद करने की अपील कररहे हैं।

तरनतारन जिले के पंजवार गांव के हालिया दौरे के दौरान जत्थेदार गड़गज ने लोगों से अपील की कि वे 30 साल से ज्यादा उम्र के युवकों की शादी कराने में मदद के लिए आगे आएं। उन्होंने लोगों से ‘भानी’ यानी शादी के प्रस्ताव में जान-बूझकर रुकावटें डालने से बचने की भी गुजारिश की। धोटियां गांव की पूर्व पंचायत सदस्य कश्मीर कौर ने कहा कि यह समस्या सभी गांवों में देखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि हर ‘पट्टी’ (गांव का एक मोहल्ला या इलाका) में लगभग 10 से 15 कुंवारे युवक हैं। इनमें अच्छे शिक्षित युवक, किसान और निजी काम-धंधों में लगे युवक शामिल हैं। लोहार गांव के एक मैचमेकर (शादी कराने वाले) बाबा प्यारा सिंह ने कहा,’हर हफ्ते पांच से सात परिवार अपने बेटों के लिए लड़की की तलाश में मेरे पास आते हैं, लेकिन जिन परिवारों में लड़कियां हैं वे बहुत कम आते हैं।’ इस स्थिति को पंजाब में कई सामाजिक और आबादी से जुड़े बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है। इनमें 1990 के दशक के बाद अल्ट्रासाउंड तकनीक के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल और कन्या भ्रूण हत्या के कारण लड़कियों की संख्या में कमी और साथ ही युवाओं का बड़ी संख्या में विदेश पलायन शामिल है। 2001 की जनगणना के अनुसार पंजाब में 0-6 साल की उम्र के बच्चों में लिंगानुपात प्रति 1,000 लड़कों पर 798 लड़कियां था, जो देश में सबसे कम में से एक था। कानूनों के सख़्त पालन और लोगों में जागरूकता बढ़ने के कारण यह अनुपात 2011 में 846 और 2025-26 में 923 हो गया।

केवल लिंगानुपात जिम्मेदार नहीं : प्रो. सुखदेव सिंह

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. सुखदेव सिंह ने कहा कि बच्चों के लिंगानुपात में असंतुलन के नतीजे अब दिखने लगे हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि शादी से जुड़े संकट के लिए सिर्फ लिंगानुपात को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पिछले तीन दशकों में पंजाब में बड़े सामाजिक बदलाव हुए हैं। उन्होंने कहा,’पहले पंजाब में लड़कियों को अक्सर शादी से पहले अकेले गांव से बाहर जाने की इजाज़त नहीं होती थी। आज लाखों पंजाबी युवतियां विदेशों में आज़ाद ज़िंदगी जी रही हैं। उनमें से कई के लिए अब पंजाब लौटकर माता-पिता की पसंद के लड़के से शादी करना ज़रूरी नहीं रह गया है।’

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।