रामगढ़ के सर्पीले रास्ते फिर मुझे पुकार रहे हैं

रामगढ़ की सर्पीली सड़कें, पहाड़, जंगल और बारिश की बूंदें फिर बुला रही हैं, जहां हर यात्रा सिर्फ सफर नहीं बल्कि यादों और सुकून से जुड़ा एक गहरा अनुभव बन जाती है।

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अजीत अंजुम

रामगढ़ के सर्पीले रास्ते, पहाड़, जंगल, बारिश और बादल मुझे फिर पुकार रहे हैं। अभी तीन दिन पहले ही वहां से लौटा हूं, लेकिन मन फिर बेचैन हो उठा है। पता नहीं ऐसा क्या है उस जगह में कि लौटने के बाद लगता है, जैसे कुछ वहीं छूट गया हो। शायद पहाड़ों का यही जादू है। वे एक बार अपने भीतर जगह दे दें, तो फिर बार-बार बुलाते हैं। दिल्ली के तापमान और गरम हवाओं का सामना होते ही अचानक रामगढ़ याद आने लगता है। शाम और सुबह की हल्की ठंड में टहलना याद आने लगता है।

कभी चीड़ और देवदार के जंगल के बीच से गुजरते रास्तों पर सैर करना, कभी पगडंडियां नापने के लिए पहाड़ों के बीच उतर जाना। कभी बारिश की बूंदों की आवाजाही से बचते-बचाते उन सर्पीली सड़कों पर बिना किसी मंज़िल के चलते चले जाने का सुख। कल फिर जाने की तैयारी है। कुछ जगहें सिर्फ घूमने के लिए नहीं होतीं, वे मन का हिस्सा बन जाती हैं। उत्तराखंड का रामगढ़ मेरे लिए ऐसी ही एक जगह है। इन सबके अलावा वहां के मित्रों की महफिल भी पुकारती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।