शंभु नाथ चौधरी

जिस शहर की सड़कें पैदल चलने लायक नहीं बचीं, वहां झील में रेस्टोरेंट बनाने की जल्दी है। जिस शहर की गलियों में गड्ढे हैं, वहां विकास की नजर पानी पर तैरते रेस्टोरेंट तक पहुंच गई है। जिस शहर की हरियाली लगातार घट रही है, पहाड़ियां काटी जा चुकी हैं और जिसकी झीलें खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहां अब झील को बचाने के बजाय झील के भीतर कारोबार उतारने की तैयारी है।
इसे विकास कहें या विकास की प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल?
हजारीबाग कभी बागों का शहर था। शहर के बीचोंबीच मौजूद तीन झीलें उसकी पहचान थीं। ये झीलें किसी पर्यटन परियोजना का हिस्सा नहीं थीं। वे शहर की प्रकृति थीं, उसकी खूबसूरती थीं, उसकी सांस थीं। लेकिन हमने पहले झीलों को सिकुड़ते देखा। पानी घटते देखा। गंदगी बढ़ते देखी। किनारों पर दबाव बढ़ते देखा। सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों की योजनाएं आते-जाते देखीं। और अब अगला अध्याय है- फ्लोटिंग रेस्टोरेंट! किसी ने यह पूछने की जरूरत महसूस की कि झील को सबसे पहले चाहिए क्या? पानी? सफाई? कैचमेंट एरिया की सुरक्षा? अतिक्रमण से मुक्ति? हरियाली? या फिर एक ऐसा रेस्टोरेंट, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अच्छी दिखें? रांची का अनुभव हमारे सामने है। झील के बीचोंबीच प्रतिमा। प्रतिमा तक पहुंचने के लिए पुल। करोड़ों की लागत। खूब चर्चा। खूब तस्वीरें। फिर धीरे-धीरे सवाल भी सामने आए-उस परियोजना का क्या हुआ? उसका रखरखाव क्या हुआ? उसने झील को कितना संवारा और कितना बोझ दिया? अगर राजधानी के अनुभव से भी हम नहीं सीखते, तो फिर अनुभव किसलिए होते हैं?
झील में निर्माण का अर्थ सिर्फ एक ढांचा खड़ा करना नहीं है। इसका मतलब है झील के प्राकृतिक क्षेत्र में मानवीय गतिविधि बढ़ाना। इसका मतलब है कचरे, प्लास्टिक, सीवेज और प्रदूषण का नया जोखिम पैदा करना। और सबसे बड़ा खतरा? जब झील में एक निर्माण हो जाता है, तो अगला निर्माण रोकने का नैतिक आधार भी कमजोर पड़ जाता है। आज रेस्टोरेंट। कल कुछ और। फिर किनारे पर कुछ और। और देखते-देखते जिस झील को बचाने के नाम पर योजना शुरू हुई थी, वही झील योजनाओं के बोझ तले दब जाएगी। यह आशंका काल्पनिक नहीं है। हमारे शहरों का विकास अक्सर इसी रास्ते चलता आया है-पहले प्रकृति को काटो, फिर उसके नुकसान की भरपाई के लिए सौंदर्यीकरण करो, फिर उस सौंदर्यीकरण को बनाए रखने के लिए नई परियोजना लाओ। प्रकृति को पहले नुकसान पहुंचाओ, फिर उसी नुकसान के इलाज का बजट बनाओ।
क्या हजारीबाग भी इसी मॉडल की ओर बढ़ रहा है? शहर के भाग्यविधाताओं को शायद यह सवाल असुविधाजनक लगे। लेकिन नागरिकों को पूछना चाहिए। जब मेन रोड पर पैदल चलना मुश्किल है, तो फ्लोटिंग रेस्टोरेंट क्यों जरूरी है? जब सड़कें गड्ढों से भरी हैं, तो झील में रेस्टोरेंट क्यों जरूरी है? जब पानी और बिजली की समस्या है, तो झील में रेस्टोरेंट क्यों जरूरी है? जब शहर की हरियाली घट रही है, तो झील में रेस्टोरेंट क्यों जरूरी है? इस फ्लोटिंग रेस्टोरेंट की जरूरत आखिर किसे है? क्या सड़कों के जानलेवा गड्ढों से जूझते हुए खुद एक ‘फ्लोटिंग ऑब्जेक्ट’ बन चुके इस शहर के आम नागरिक को? या फिर विकास के उन स्वघोषित ठेकेदारों को, जिन्हें ऐसी बेतुकी योजनाओं में सिर्फ अपने निहित स्वार्थ दिखते हैं? और उस व्यवस्था को, जिसे असली विकास से कोई सरोकार नहीं, बस विकास के नाम पर बजट ठिकाने लगाने का ज़रिया चाहिए?
झील को बचाना है तो उसे झील रहने दीजिए। उसमें पानी लौटाइए। उसकी गहराई बचाइए। उसकी हरियाली बचाइए। उसका प्राकृतिक क्षेत्र बचाइए। उसे प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाइए। झील के ऊपर विकास मत तैराइए। पहले झील को ऐसी अदूरदर्शी योजनाओं के घोटाले में डूबने से बचाइए। क्योंकि किसी शहर की पहचान उसके फ्लोटिंग रेस्टोरेंट से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसने अपनी नदी, अपनी झील, अपने पेड़ और अपनी जमीन को आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना बचाया।
हजारीबाग के सामने फैसला सिर्फ एक रेस्टोरेंट का नहीं है। फैसला यह है कि शहर अपनी बची हुई प्रकृति को विरासत मानेगा या उसे भी एक और परियोजना में बदल देगा। टैक्सपेयर्स के पैसों को इस तरह जल-समाधि देने और प्रकृति को तबाह करने की जिद को विकास नहीं, दृष्टिहीनता कहा जाता है। अगर आज हजारीबाग के नागरिकों ने इस ‘प्रदूषण के नए रास्ते’ के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो आने वाली नस्लें हमसे सवाल पूछेंगी कि जब बागों और झीलों के शहर को कंक्रीट और कचरे का ढेर बनाया जा रहा था, तब हम खामोश क्यों थे? जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं।


