
दयानंद राय
रांची : ब्रिटिश शासनकाल में अस्तित्व में आनेवाली रांची की कहानी दिलचस्प है। ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक रांची डिस्पेंसरी की स्थापना वर्ष 1855 में की गयी थी, इसका इंचार्ज लंबे समय तक भारतीय डॉक्टर रहा। स्थानीय लोगों से जो शुल्क वसूला जाता था उससे ही उस डॉक्टर को वेतन दिया जाता था। वर्ष 1872 में रांची में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ और यहां एक नया अस्पताल खुला जिसमें 18 पेशेंट्स को भर्ती करने की सुविधा थी। उस साल इस अस्पताल में 146 मरीज भर्ती हुए और इसकी ओपीडी में 1789 मरीजों का इलाज हुआ।

बाद के बारह वर्षों में इस अस्पताल का विस्तार हुआ और यह एक कच्चा बिल्डिंग के रुप में विकसित हुआ। इसका आकार बढ़ चुका था। 1913 में यहां संक्रामक रोगों के लिए दो वार्ड बनकर तैयार हुए। 1914 में यहां 20000 रुपये की लागत से नयी ओपीडी बिल्डिंग बनकर तैयार हो गयी। यह अस्पताल सिविल सर्जन के अंतर्गत आता था और वर्ष 1915 में इस अस्पताल में 17466 मरीजों का इलाज किया गया। रांची के बाद लोहरदगा में डिस्पेंसरी की स्थापना 1881 में की गयी। बाद में 15000 रुपये खर्च करके इसे विस्तार दिया गया। बाद में बुंडू और चैनपुर में वर्ष 1902 में डिस्पेंसरी खुली, गुमला में 1903 में और सिल्ली में 1906 तथा खूंटी में 1907 में डिस्पेंसरी खुली।
यह वो वक्त था जब इंग्लैंड में किंग एडवर्ड का शासन चल रहा था। तब जो सबसे सफल प्राइवेट डिस्पेंसरी थी वो मुरहू में संचालित की जा रही थी। इसे एसपीजी मिशन चलाता था और जिला परिषद से इसे अनुदान भी मिलता था। इस डिस्पेंसरी को रेव्ह डॉ केनेडी ने 1905 में खोला था। रांची में संचालित एलिजाबेथ डिस्पेंसरी को लुथेरन मिशन चलाता था। रांची में वैक्सीनेशन की शुरुआत 1867 में की गयी।

