रांची : झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 12 किलोमीटर पश्चिम में रातू नामक स्थान पर रातू किला स्थित है, जो नागवंशी राजवंश की ऐतिहासिक और शाही विरासत का प्रतीक है। 22 एकड़ में फैले रातू किले में हैं 103 कमरे हैं। वर्ष 1870 में नागवंशी राजाओं ने अपनी राजधानी पालकोट से हटाकर रातू में स्थापित की थी। इसके बाद छोटानागपुर के नागवंशी शासक महाराजा उदय प्रताप नाथ शाहदेव ने इस भव्य किले का निर्माण कार्य 1899 से 1901 के बीच करवाया था। इसकी वास्तुकला ब्रिटिश स्थापत्य कला और भारतीय परंपरा का सुंदर संगम है। इसका डिज़ाइन लंदन के बकिंघम पैलेस की तर्ज पर तैयार किया गया है।

इसके मुख्य द्वार पर नाग-नागिन की बड़ी मूर्तियां बनी हुई हैं। इस राजवंश का इतिहास प्रथम राजा फणिमुकुट राय से जुड़ा है। किंवदंती के अनुसार, बचपन में फणिमुकुट राय की रक्षा एक फन फैलाए हुए नाग ने की थी, जिसके बाद इस वंश का नाम ‘नागवंशी’ पड़ा और इनका राजकीय प्रतीक कोबरा (नाग) बना। रातू किले में दुर्गा पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है (राजा फणिमुकुट राय के समय से मानी जाती है)। किले में महाअष्टमी और महानवमी के दौरान यहां पारंपरिक रूप से बकरे और काड़ा (भैंसे) की बलि देने की प्रथा आज भी निभाई जाती है।: आम दिनों में यह किला निजी निवास/राजपरिवार के अधीन रहता है, लेकिन हर साल दुर्गा पूजा (सप्तमी से दशमी/एकादशी तक) के अवसर पर इसे आम जनता और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। किले के अंदर विशाल बगीचे, पुराने अस्त्र-शस्त्र, मंदिर और सभा भवन मौजूद हैं।


