अगर पदक नहीं जीतता, तो मैराथन में जाने का फैसला समय की बर्बादी होता: बरवाल

एशियाई खेलों में सावन बरवाल ने मैराथन में रजत पदक जीतते हुए अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। हिमाचल के इस धावक ने इसे अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया।

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नागोया: सावन बरवाल के लिए इस साल की शुरुआत में मैराथन में जाने का फैसला महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि उन्होंने शनिवार को यहां एशियाई खेलों में रजत पदक जीता और इसके बाद कहा कि अगर वह यह उपलब्धि हासिल नहीं करते तो यह ‘‘समय की बर्बादी’’ होती। बरवाल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मैराथन में भारत को अप्रत्याशित रजत पदक दिलाया और इस दौरान अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। उन्होंने 42.195 किलोमीटर की दूरी दो घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड में पूरी की। यह मैराथन में उनका लगातार दूसरा राष्ट्रीय रिकॉर्ड था। इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम में उन्होंने अपने करियर की पहली मैराथन दौड़ में ही 2:11:58 के समय के साथ शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया था।

सेना में कार्यरत इस 28 वर्षीय एथलीट ने मीडिया से कहा, ‘‘यह पदक मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं 15-16 साल से अभ्यास और प्रतिस्पर्धा कर रहा हूं। अगर मुझे यह पदक नहीं मिलता तो यह सब व्यर्थ जाता और समय की बर्बादी होती। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।’’ हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदर नगर के रहने वाले बरवाल के पिता कुलदीप नयी दिल्ली में ड्राइवर के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी मां सुभद्रा देवी गृहिणी हैं।

बरवाल पिछले एक दशक से भी अधिक समय से लंबी दूरी की दौड़ में भाग ले रहे हैं। उन्हें अपने भाई से प्रेरणा मिली जो स्कूल की एथलेटिक्स टीम में शामिल थे। एक दिन वह अपने भाई के साथ गए और ट्रैक के किनारे दौड़ने लगे। इसके बाद उन्हें 14 साल की उम्र में 1500 मीटर की दौड़ के लिए स्कूल की टीम में शामिल कर लिया गया।

राष्ट्रीय स्तर पर वह पहली बार 2015 में अंडर-18 वर्ग में 3000 मीटर की दौड़ में शामिल हुए। उनका पहला सीनियर स्तर का मुकाबला 2021 में फेडरेशन कप में 5000 मीटर की दौड़ थी। उन्होंने देहरादून में 2025 के राष्ट्रीय खेलों में 5,000 मीटर और 10,000 मीटर दोनों में स्वर्ण पदक जीता। वह 2019 में खेल कोटा के तहत अपने बड़े भाई के साथ सेना में भर्ती हो गए थे। पुणे के सैन्य खेल संस्थान में यूनिस खान और रिलायंस फाउंडेशन में अजीत मार्कोस जैसे अपने कोच की सलाह पर उन्होंने मैराथन की ओर रुख किया। उनका वीओ2 मैक्स (अधिकतम ऑक्सीजन ग्रहण क्षमता) उच्च पाया गया था, जो उन्हें 42.195 किमी की दूरी के लिए बहुत अच्छा धावक बनाता है।

बरवाल ने कहा, ‘‘मुझे मैराथन में अच्छा प्रदर्शन करने का पूरा भरोसा था। इसलिए यह सही फैसला था।’’ बरवाल से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता था कि वह अपनी पहली दो मैराथन दौड़ में ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाएंगे, उन्होंने कहा, ‘‘मैंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने के लक्ष्य के साथ ही मैराथन में भाग लिया था। मैराथन में भारतीय एथलीट दो घंटे 12 मिनट से कम समय नहीं निकाल पा रहे थे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैंने इसे चुनौती के रूप में लिया। मैंने स्वयं से कहा कि अगर मैं दो घंटे 12 मिनट से कम समय में दौड़ पूरी नहीं कर पाता, तो मैराथन दौड़ने का कोई मतलब नहीं है।’’ एशियाई खेलों में हालांकि उनका पूरा ध्यान पदक जीतने पर था। उन्होंने कहा, ‘‘आज मैं राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने के लिए नहीं दौड़ा। मेरा लक्ष्य पदक जीतना था। जब मैंने अच्छी गति से दौड़ना शुरू किया तब मुझे लगा कि मैं राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ सकता हूं।’’

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।