- महेश झालानी
Ananta Group Scandal: राजस्थान के प्रशासनिक गलियारों में इस वक्त उस काले खेल की गूंज है, जिसने शासन और व्यवस्था की चूलें हिलाकर रख दी हैं। राज्य के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और मुख्यमंत्री के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव शिखर अग्रवाल और उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर के नाम पर खुली लूट और भ्रष्टाचार का एक ऐसा बेपरदा सच सामने आया है, जिसे देखकर हर कोई सन्न है।

कागजों में महज 15 से 16 लाख रुपये में मिलने वाले लग्जरी विला और कॉटेज का असली बाजार मूल्य असल में पौने दो से ढाई करोड़ रुपये तक है।
उदयपुर से लेकर अलवर के अजबगढ़ और महाराष्ट्र के करजत तक फैले इस साम्राज्य में अनंता ग्रुप के मुकुंद गोयल के साथ मिलकर करोड़ों की संपत्तियों को कौड़ियों के भाव खरीदने और फिर उसी कंपनी से हर साल 1.80 करोड़ की लीज वसूलने का जो ‘मुनाफाखोर मॉडल’ रचा गया, उसने प्रशासनिक आचार संहिता की धज्जियां उड़ा दी हैं।

हालांकि सरकार ने अपनी साख बचाने के नाम पर शिखर अग्रवाल को एपीओ कर खानापूर्ति जरूर कर ली है, लेकिन इस पूरे खेल की सह-मास्टरमाइंड रहीं उनकी आईपीएस पत्नी को अब तक बचाए रखना कई बड़े सियासी और प्रशासनिक सवाल खड़े करता है।
जेडीए आयुक्त से लेकर सीएमओ तक मलाईदार पदों पर रहते हुए अर्जित किए गए 1000 करोड़ रुपये से अधिक के इस कथित काले साम्राज्य की गंध अब केंद्रीय जांच एजेंसियों तक पहुंच चुकी है, और वैशाली नगर के फ्लैट के फिजिकल वेरिफिकेशन से शुरू हुई यह गुप्त जांच अब इस रसूखदार पति-पत्नी के हर एक अवैध राज को उधेड़ने के लिए पूरी तरह से रफ्तार पकड़ चुकी है। इस पूरे स्कैंडल की तह में उतरने पर पता चलता है कि किस प्रकार कागजों पर संपत्ति के दाम नगण्य दिखाकर काले धन को सफेद करने का खेल खेला गया।
पिछले ढाई वर्षों (सितंबर 2023 से मार्च 2026) के दौरान उदयपुर के बुझड़ा स्थित अनंता रिसॉर्ट में 20 कॉटेज और अलवर के अजबगढ़ स्थित अनंता रिसॉर्ट में 20 विला खरीदे गए। दस्तावेजों में उदयपुर के इन कॉटेज की कीमत मात्र 15 लाख रुपये प्रति इकाई और अलवर के विला की कीमत 14 लाख से 16.5 लाख रुपये के बीच दर्शाई गई। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि उदयपुर में इन संपत्तियों का वास्तविक बाजार मूल्य करीब 1.80 करोड़ रुपये और अलवर के अजबगढ़ में 2.40 करोड़ रुपये प्रति विला है।
सवाल यह उठता है कि अनंता ग्रुप (गोयल फैशंस) के मुकुंद गोयल ने अपनी प्रीमियम संपत्तियां शिखर अग्रवाल और उनके परिवार को इतनी औने-पौने दामों पर क्यों बेचीं? इसका जवाब उनके द्वारा रचे गए लीज-बैक मॉडल में छिपा है। संपत्तियों की खरीद और उन्हें उसी कंपनी को किराए पर देने के समझौते एक ही दिन पंजीकृत कराए गए। उदयपुर की संपत्तियों पर 4 लाख रुपये प्रतिवर्ष और अलवर की संपत्तियों पर 5 लाख रुपये प्रतिवर्ष का भारी-भरकम किराया तय किया गया। इस तरह इस परिवार को इन 40 संपत्तियों से कुल 1.80 करोड़ रुपये की वार्षिक लीज आय बिना किसी जोखिम के मिलना तय कर ली गई।
बताया जाता है कि शिखर अग्रवाल द्वारा अपने प्रभाव वाले पदों (जेडीए आयुक्त, नगर विकास, सीएमओ आदि) का इस्तेमाल कर अनंता ग्रुप को नीतिगत या प्रशासनिक फायदे पहुंचाए गए होंगे, जिसके एवज में यह बेजोड़ रेवेन्यू मॉडल तैयार किया गया। उसीका नतीजा है कि गोयल फैशंस की ओर से करीब 170 करोड़ की संपति कोडियो के हवाले की गई । लूट के इस कारोबार में समूचा परिवार लिप्त है । जयपुर के एक बहुत बड़े रियल एस्टेट ग्रुप से भी शिखर की न केवल सांठगांठ है बल्कि बहुत मोटा पैसा इस ग्रुप में निवेश है ।
मामला केवल 40 विला तक सीमित नहीं है। केंद्रीय जांच एजेंसियों को मिली पुख्ता शिकायतों के मुताबिक, शिखर अग्रवाल ने अपने सेवाकाल के दौरान अकूत संपत्तियां बनाई हैं, जिनका कुल मूल्य 1000 करोड़ रुपये से अधिक आंका जा रहा है। जांच की सुई पिछले साल मई 2025 से ही घूमनी शुरू हो गई थी, जब केंद्र की एक जांच एजेंसी ने जयपुर के वैशाली नगर स्थित उनके फ्लैट का भौतिक सत्यापन किया था। हालांकि बीच में कुछ समय के लिए सुस्त पड़ी इस जांच ने अब पूरी रफ्तार पकड़ ली है। उस वक्त मकान का वेरिफिकेशन छापा मारने की नीयत से किया गया था । शिखर अग्रवाल के अलावा एक अन्य आईएएस पर भी हाथ डालने की योजना थी ।
ज्ञात हुआ है कि इन शिकायतों में जयपुर, उदयपुर, अलवर के अलावा महाराष्ट्र के करजत स्थित अनंता प्रोजेक्ट में भी बड़े पैमाने पर बेनामी और गुप्त निवेश होने के सुराग हाथ लगे हैं। इसके अतिरिक्त, विदेशों में किए गए भारी निवेश और शेल कंपनियों के जरिए फंड डायवर्ट करने की विस्तृत जानकारियां भी केंद्रीय एजेंसियों के पास पहुंच चुकी हैं। इस पूरे महाघोटाले में सरकार की भूमिका और प्रशासनिक ईमानदारी पर सबसे बड़ा बट्टा तब लगता है जब पति-पत्नी की दोहरी भूमिका सामने आती है।
जिन 40 संपत्तियों के सौदे हुए हैं, उनमें से 18 विला/कॉटेज सीधे तौर पर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और शिखर अग्रवाल की पत्नी प्रशाखा माथुर के नाम पर दर्ज हैं। इसके बावजूद, सरकार ने केवल पति शिखर अग्रवाल को एपीओ कर अपनी गर्दन बचाने की कोशिश की है, जबकि प्रशाखा माथुर अभी भी अपने पद पर मजे सेराज कर रही हैं। हद तो तब हो गई जब आधिकारिक अचल संपत्ति विवरण (IPR) में प्रशाखा माथुर के कॉलम में संपत्ति का ब्यौरा ‘शून्य’ दर्शाया गया, जिसे बाद में तकनीकी गलती का नाम देकर लीपापोती करने की कोशिश की जा रही है ।
यह प्रकरण महज कुछ संपत्तियों की खरीद-फरोख्त का नहीं, बल्कि खाकी और खादी के गठजोड़ से देश की प्रशासनिक व्यवस्था को भीतर से खोखला करने का एक नग्न उदाहरण है। जनता की गाढ़ी कमाई और पद की गरिमा को ताक पर रखकर बनाए गए इस 1000 करोड़ के साम्राज्य पर अब केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा कस चुका है।
एपीओ की महज कागजी कार्रवाई से इस भ्रष्टाचार के फंदे को ढीला नहीं किया जा सकता; जब तक इस पूरे नेक्सेस में शामिल हर एक चेहरे विशेषकर पद के दुरुपयोग में लिप्त आईपीएस पत्नी पर कानून का डंडा नहीं चलता, तब तक इस व्यवस्था की साख बहाल नहीं हो सकती।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


