
नई दिल्ली: संसद की एक संयुक्त समिति ने कहा है कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 से व्यापक नियामक शक्तियां एक ही केंद्रीय नियामक के पास केंद्रित हो सकती हैं जिससे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका है। संयुक्त समिति की मसौदा रिपोर्ट के अनुसार, विधेयक में प्रस्तावित अलग-अलग स्तर के दंड की व्यवस्था को मनमाने तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। यह विधेयक पिछले वर्ष दिसंबर में लोकसभा में पेश किया गया था जिसके बाद इसे संसद की संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया। तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को समाप्त कर एक एकीकृत नियामक आयोग बनाने का प्रस्ताव रखा गया है ताकि देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए जा सकें। सरकार ने बृहस्पतिवार को समिति की रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद विधेयक को विचार और पारित करने के लिए सूचीबद्ध किया।
मसौदा रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘समिति ने आशंका जताई कि यदि इतनी अधिक नियामक शक्तियां एक ही केंद्रीय नियामक के हाथ में होंगी, तो नौकरशाही या किसी खास विचारधारा का जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप बढ़ सकता है। इससे शिक्षण संस्थानों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मौजूदा व्यवस्था में मिली स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।’’ समिति ने कहा कि विधेयक में अलग-अलग स्तर के दंड की व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है, लेकिन नियामक परिषद को मनमाने तरीके से दंड लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

