

कोलकाता : कोलकाता की सड़कों पर बांसुरी बेचने वाले 70 वर्षीय अनिल कुमार मोहांत की कहानी संघर्ष और जिम्मेदारी की मिसाल है। पूर्व बर्धमान के एक दूरदराज गांव से वह रोज़ करीब दो घंटे का सफर तय कर कोलकाता आते हैं। उनकी पत्नी को दो बार स्ट्रोक आ चुका है और वह ठीक से बोल भी नहीं पातीं। उनके इलाज और दवाइयों पर हर महीने करीब 10 से 15 हजार रुपये खर्च होते हैं। अनिल खुद भी डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे हैं, लेकिन पत्नी के इलाज के लिए काम करना नहीं छोड़ते।





वह दमदम टिकट काउंटर के आसपास बांसुरी बेचते हैं। कई बार रात कॉलेज स्ट्रीट के फुटपाथ पर ही गुजारनी पड़ती है। उन्हें दो बार मलेरिया भी हो चुका है, फिर भी अगली सुबह बांसुरियों का गठ्ठर लेकर निकल पड़ते हैं। अनिल ने सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की है। 15 साल की उम्र में कोलकाता आए और यहीं बांसुरी बनाना-बजाना सीखा। एक समय वह रोज़ करीब 200 बांसुरियां तक बेच लेते थे और इसी कमाई से अपने बच्चों का पालन-पोषण किया।
आज उम्र और कमजोर शरीर ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं, लेकिन पत्नी के लिए उनका संघर्ष अब भी जारी है। कोलकाता की सड़कों पर सुनाई देती उनकी बांसुरी की आवाज़ सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि हिम्मत, जिम्मेदारी और जीवनसाथी के प्रति समर्पण की कहानी भी है।
