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पैसे की तंगी के कारण जिला स्कूल से गांव के अपने घर तक बंदी उरांव 70 किमी पैदल चला करते थे
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एक बार एक चौकीदार को उसकी सेवा से हटा दिया गया था तो बाबा बंदी उरांव ने एसएसपी को कहकर उस चौकीदार को सेवा में बहाल करवाया था
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राजनीति उनके लिए सेवा का मार्ग था जिसमें अपनी राह में आनेवाली मुश्किलों का सामना करते हुए अनवरत चलते रहे
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बाबा बंदी उरांव संघर्षों में तपकर निखरे और निखरकर चमके थे
दयानंद राय
संघर्ष की लंबी अंधेरी काली रात में उम्मीदों का दीप लिए लंबा चलना पड़ता है। असफलताओं से अनवरत जूझना और राह के कांटों से पैरों को छलनी करना पड़ता है तब जाकर कोई जननायक बनता है, बाबा बंदी उरांव बनता है और जब बंदी उरांव बनता है तो समाज का कल्याण करता है और जब समाज का कल्याण करता है तो समाज भी ऐसे युगपुरुष के योगदान को अनवरत याद करता है, उन्हें शीश नवाता है और उनका पुण्य स्मरण करता रहता है।
बाबा बंदी उरांव भी एक दिन में जननायक नहीं बने थे। उसके पीछे वर्षों की तपस्या थी, आदिवासी समाज के लिए अपना हित कुर्बान करने का भाव था और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदारी थी। वे संघर्षों में तपकर निखरे और निखरकर चमके थे।
कवि अज्ञेय की एक पंक्ति है जिसमें वे लिखते हैं- दुख सबको मांजता है और चाहे-स्वयं सबको मुक्ति देना वह न चाहे, किंतु जिनको मांजता है उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें। अज्ञेय की पंक्तियों की तरह ही बाबा बंदी उरांव का जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। पिता किसान थे, अंग्रेजी राज के भारत में किसानों की जो दुर्दशा थी उसका साक्षात उन्होंने किया था, अपने पिता की तकलीफें देखीं थी और अपने गांव के लोगों के दुख को साक्षात भी किया था।
1940 में जब उनका नामांकन रांची जिला स्कूल में हो गया तो गांव के बालक बंदी उरांव का एक नई दुनिया से साक्षात्कार हुआ। जिला स्कूल की विशाल बिल्डिंग, विशाल कैंपस और विद्वान शिक्षकों के समूह ने उनमें पढ़ाई के प्रति नई ऊर्जा भर दी। पर पैसे की तंगी तब भी एक कड़वा सच थी तो बंदी उरांव को पैसों की कमी के कारण रांची से सिसई और वहां से अपने घर करीब 70 किमी पैदल चलकर जाना होता था। बंदी उरांव थोड़े समय के बाद इस दूरी को पैरों से नापने के अभ्यस्त हो गए थे।
उनकी यह स्थिति करीब छह साल तक रही और इन छह सालों में वे पैदल 70 किमी का सफर तय कर घर जाते थे। वर्ष 1946 का समय उनके लिए खुशियां लेकर आया क्योंकि उस समय उनके मामा ने उनकी दिक्कतों को देखकर एक साइकिल दी। इसके बाद बंदी उरांव का स्कूल से घर का सफर कुछ आसान हो गया।
हिन्दी, उर्दू और बांग्ला तीनों में सर्वश्रेष्ठ समझे गए
रांची जिला स्कूल में विद्वान शिक्षकों के समूह ने प्रतिभावान बंदी उरांव की प्रतिभा को सलीके से गढ़ा, नतीजा यह हुआ कि जो बालक पांचवीं कक्षा में फेल हो गया था वह रांची जिला स्कूल में हिन्दी, उर्दू और बांग्ला तीनों में सर्वश्रेष्ठ स्थान हासिल करने लगा। न केवल पढ़ाई बल्कि खेल में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा की धाक जमा दी। रांची जिला स्कूल में उनका यह स्थान मैट्रिक तक बना रहा। बाद में उन्होंने पटना साइंस कॉलेज से साइंस में इंटर किया। पटना साइंस कॉलेज में भी उनकी प्रतिभा लोगों को चमत्कृत करती थी। यहां भी वे विश्वविद्यालय के फुटबॉल और हॉकी टीम के उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में चयनित होते रहे। इसके अलावा वे पटना विश्वविद्यालय की रेसिंग प्रतियोगिताओं में सभी वर्गों में स्थान प्राप्त करते रहे और 10,000 मीटर की दौड़ में चैंपियन वही बनते थे।
टूट गया इंजीनियर बनने का सपना
बंदी उरांव का सपना इंजीनियर बनने का था लेकिन उस समय इंजीनियर बनना कोई आसान काम नहीं था। प्रतिभावान होने के कारण बंदी उरांव का चयन इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। उन्होंने एक साल तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी की लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था। उनकी तबीयत खराब हो गयी और वो गंभीर रुप से बीमार पड़ गए। काफी समय तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा और फिर उनके पिता जोगिया उरांव उन्हें लेकर घर आ गए। काफी दिनों के बाद उनका नामांकन पटना विश्वविद्यालय में कराया गया और यहां से उन्होंने बीए किया। इसके बाद बीपीएससी के जरिये उनका चयन पुलिस सेवा में हो गया। अब उनकी जिंदगी कुछ सुविधापूर्ण हो गयी थी, समाज में उन्हें आदर और सत्कार मिलने लगा था।
नौकरी वे पूरे मनोयोग से कर रहे थे लेकिन समाजसेवा और राजनीति में आने का विचार बार-बार उनके जेहन में कौंध रहा था। वे अपने राजनीति में आने की चाहत को अपने आदर्श बाबा कार्तिक उरांव के सामने रखते थे, पर कार्तिक उरांव दूरदर्शी थे, वे हर बार उन्हें उचित समय आने की प्रतीक्षा करने को कहते थे। आखिरकार एक दिन बाबा बंदी उरांव की राजनीति में आने की पुकार ईश्वर ने सुन ली और वर्ष 1980 के किसी दिन बाबा कार्तिक उरांव ने कहा कि अब आपके राजनीति में आने का समय आ गया है। इसके बाद वे उन्हें दिल्ली ले गये और उनकी मुलाकात दिल्ली में तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह से करायी।
ज्ञानी जैल सिंह से आश्वस्ति पाने के बाद उन्होंने गिरिडीह एसपी की नौकरी से वीआरएस ले लिया। 30 अप्रैल 1980 को उनका स्वैच्छिक सेवानिवृति का आवेदन स्वीकृत हुआ और मई में उन्हें सिसई विधानसभा से कांग्रेस का टिकट मिल गया। चुनाव में उनका सामना पूर्व मंत्री ललित उरांव से हुआ और पीके घोष तथा कार्तिक उरांव के सहयोग से उन्होंने ललित उरांव को पराजित किया।
जीवनभर पुरानी एंबेसडर से चले
बंदी उरांव संघर्षों में तपकर पहले सरकारी सेवा और बाद में राजनीति में आए थे। उन्होंने आम लोगों की तकलीफें देखी थीं। पुलिस महकमे में आम आदमी की समस्याओं से वे वाकिफ थे और सबसे बढ़कर सेवा का जज्बा उनमें कूट-कूट कर भरा था। पुलिस सेवा में जाने से पहले वे थोड़े दिनों तक शिक्षक का भी काम कर चुके थे, ऐसे में एक आदर्श शिक्षक का आवरण उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बन चुका था।
राजनीति में आने और विधायक बनने के बाद वे चाहते तो अपने पसंद की हर कार खरीद सकते थे पर सेवा और त्याग का भाव उनमें प्रबल था, उन्होंने तय किया कि क्षेत्र में घूमने के लिए वे एक पुरानी गाड़ी खरीदेंगे और उन्होंने कभी अपने लिए नई गाड़ी नहीं ली।
गरीब चौकीदार को हटा दिया तो एसएसपी को कहकर उसे फिर से बहाल करवाया
बाबा बंदी उरांव संवेदनशील राजनेता थे, उनकी संवेदनशीलता को याद करते हुए पूर्व आइपीएस अधिकारी शीतल उरांव याद बताते हैं कि एक बार एक गरीब चौकीदार को रांची जिला में सेवा से हटा दिया गया था। जब मैंने इस मामले से उन्हें अवगत कराया तो उन्होंने तुरंत एसएसपी से बात की और एक कठोर और मार्मिक पत्र एसएसपी को लिखा। उनका पत्र लेकर शीतल उरांव एसएसपी के पास गए। बाद में उस चौकीदार को सेवा में फिर से बहाल कर लिया गया। शीतल उरांव कहते थे कि अपनी अंतिम सांस तक वे समाज के उत्थान के लिए सक्रिय रहे।
