
भारत सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ाकर 30 प्रतिशत (E30) करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इसका मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। फिलहाल देश में E20 ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है, जिसमें 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल शामिल होता है। अब सरकार E30 मानक लागू करने की तैयारी कर रही है।
इथेनॉल एक जैविक ईंधन (बायोफ्यूल) है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने से तैयार किया जाता है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है, जिससे देश को वैकल्पिक ईंधन उत्पादन में मदद मिल रही है।
गन्ने से कैसे बनता है इथेनॉल?
फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल तैयार करने की प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों में पूरी होती है।
1. रस निकालना और सफाई
सबसे पहले चीनी मिलों में गन्ने से रस निकाला जाता है। इस रस में मौजूद अशुद्धियों को हटाने के लिए इसमें चूने का पानी मिलाकर गर्म किया जाता है। इससे साफ और शुद्ध रस प्राप्त होता है।
2. फर्मेंटेशन (किण्वन)
साफ रस को बड़े टैंकों में डालकर उसमें यीस्ट मिलाया जाता है। यीस्ट रस में मौजूद शर्करा को इथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देता है। यह प्रक्रिया 24 से 72 घंटे तक चलती है। इसके बाद आसवन प्रक्रिया से लगभग 95% शुद्ध इथेनॉल प्राप्त होता है।
3. डिहाइड्रेशन
पेट्रोल में मिलाने के लिए इथेनॉल का पूरी तरह पानी मुक्त होना जरूरी होता है। इसलिए विशेष “मॉलिक्यूलर छलनी” तकनीक के जरिए उसमें बचा पानी हटाया जाता है। अंत में 99.5% शुद्ध फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल तैयार होता है।
क्या पुरानी गाड़ियों पर पड़ेगा असर?
E30 ईंधन को लेकर सबसे बड़ी चिंता पुरानी गाड़ियों को लेकर है। विशेषज्ञों के अनुसार, इथेनॉल में संक्षारक गुण होते हैं और यह नमी को जल्दी सोखता है। इससे पुरानी गाड़ियों के इंजन और फ्यूल सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
इंजन और पाइप्स को नुकसान
पुरानी गाड़ियों के रबर पाइप, गास्केट और कार्ब्युरेटर उच्च इथेनॉल मिश्रण के कारण जल्दी खराब हो सकते हैं।
माइलेज में कमी
इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। इसलिए E30 इस्तेमाल करने पर पुरानी गाड़ियों का माइलेज 5 से 10 प्रतिशत तक घट सकता है।
स्टार्टिंग की समस्या
यदि वाहन लंबे समय तक खड़ा रहे तो इथेनॉल नमी सोख सकता है, जिससे गाड़ी स्टार्ट होने में दिक्कत आ सकती है।
समाधान क्या है?
सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल इंजन तकनीक पर काम कर रही हैं। भविष्य की गाड़ियां E20 से E85 तक के इथेनॉल मिश्रण को आसानी से इस्तेमाल कर सकेंगी। वहीं पुरानी गाड़ियों के लिए कम इथेनॉल वाला ईंधन उपलब्ध कराया जाएगा ताकि उन्हें नुकसान न पहुंचे।

