पत्रकारों और पत्रकारिता की “फिकर” किसको है?

जो सच दिखाते हैं, उनकी आवाज़ कौन सुनेगा, उनके संघर्ष को कौन समझेगा और उनके जीवन की तकलीफों की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?

News Aroma
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दयानंद राय

जबसे सूचना मिली कि मेरठ में पत्रकार राजेश अवस्थी जी ने खुदकुशी कर ली तबसे पत्रकारों की स्थिति खासकर पत्रकारिता में अपना जीवन खपा देनेवाले पत्रकारों की स्थिति के बारे में सोचता रहा। जो जानकारी मिली उसके अनुसार वे 66 साल के थे और तंगहाली में अपना जीवन यापन कर रहे थे। कितना दुखद होगा उनके लिए किसी के सामने हाथ फैलाना। उनके भीतर के पत्रकार ने किसी के आगे हाथ फैलाने की जगह अपनी इहलीला समाप्त कर लेना बेहतर समझा होगा और यही उन्होंने किया।

अक्सर सुनने को मिल जाता है कि फलाना पत्रकार कम दलाल ज्यादा है, फलाना पत्रकारिता कम और जमीन का धंधा ज्यादा करता है। ऐसी अनेक तरह की बातें सुनने को मिलती है। पर ऐसी टिप्पणियां करनेवाले लोग ये भूल जाते हैं कि पत्रकार किन परिस्थितियों में अपना काम करता है। कुछ गिने-चुने को छोड़ दें तो अधिकांश पत्रकारों को आज भी इतना वेतन नहीं मिलता कि ढंग के घर में रह सकें और ढंग का जीवन जी सकें।

बच्चों की स्कूल फीस तक न भर पाने की स्थिति पत्रकारों के जीवन की सच्चाई है। हालात ऐसे रहते हैं कि चादर हमेशा छोटी ही रहती है। ऐसी स्थिति में समाज को पत्रकारों से साधु होने की दरकार है, समाज पत्रकारों से अपेक्षाएं रखता है लेकिन पत्रकार किससे अपेक्षा करें। समाज से, हुक्मरानों से, अपने नियोक्ताओं से या फिर खुद अपने आप से। पत्रकारों के नाम पर जो पत्रकार संगठन चलते हैं उनसे भी पत्रकारों का हित नहीं सधता।

एक दौर था कि पत्रकारों में मजीठिया वेतन आयोग का बहुत शोर था, लेकिन वो शोर भी धीरे-धीरे गुम हो गया। कुल मिलाकर आजादी के बाद से अब तक अधिसंख्य पत्रकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं है। रांची में ही कई पत्रकार जिनका नाम मैं नहीं लेना चाहूंगा आर्थिक तंगी का शिकार होकर अपना इलाज तक करवा पाने की स्थिति में नहीं रहे। रांची प्रेस क्लब ने और राज्य सरकार ने उनकी मदद की पर वह मदद नाकाफी थी। मैं ये नहीं कहता कि पत्रकारों से समाज को उम्मीद नहीं करनी चाहिए लेकिन यह भी समाज और सत्ता का कर्तव्य है कि वो उनका भी ध्यान रखें जो सबकी खबर रखते हैं पर अपनी ही खबर नहीं रख पाते।

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