
क्या झारखँड से भाजपा अपनी राज्यसभा सीट बचा पाएगी?
क्या इस चुनाव में सेकेंड वरीयता वोट भाजपा का नैय्या पार लगा पाएगा?
क्या भाजपा राज्यसभा चुनाव में बिहार मॉडल अपनाएगी?
क्या है बिहार मॉडल, कैसे काम करता है सेकेंड वरीयता वोट, क्या होगा राज्यसभा चुनाव का समीकरण। चर्चा करेंगे तमाम मुद्दों पर …
झारखंड सहित कई राज्यों के लिए 18 जून को राज्यसभा का चुनाव होने वाला है। चुनाव को लेकर तैयारियां चल रही है लेकिन झारखंड में एक बार फिर भाजपा कमजोर पड़ती नजर आ रही है। वजह, संख्याबल की कमी। भाजपा के पास पर्याप्त संख्या नहीं है जिसकी वजह से भाजपा की सीट पर संकट के बादल गहरा रहे हैं। लेकिन भाजपा अब चुनाव के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। बता दें झारखंड के लिए राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए 28 वोटों की जरुरत पड़ती है। चूंकि झामुमो के पास 34 विधायक अपने हैं इसलिए झामुमो की जीत तो तय मानी जा रही है लेकिन भाजपा के गठबंधन दलों के साथ मिलाकर भी विधायकों का आंकड़ा महज 24 पहुंच रहा है जिससे भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो रही है।
बता दें झारखंड से दो राज्यसभा की सीटें खाली हो रही है एक सीट दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन की है और दूसरी भाजपा से दीपक प्रकाश की, अब उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है। इन्हीं दो सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होने वाले हैं। लेकिन अब भाजपा के सामने संख्याबल जुटाने की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।
हालांकि अब इसी बीच झारखंड में सेकेंड वरीयता वोट की चर्चा तेज हो गई है।
झारखंड राज्यसभा चुनाव इस बार सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि रणनीति और “सेकेंड वरीयता वोट” का चुनाव बनता दिख रहा है। पहली बार ऐसा माहौल बन रहा है कि मुकाबले का फैसला सीधे प्रथम वरीयता वोट से नहीं, बल्कि दूसरी पसंद यानी Second Preference Vote से हो सकता है। राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या बीजेपी बिहार की तरह झारखंड में भी “सेकेंड वरीयता” के सहारे जीत का रास्ता निकाल सकती है?
आखिर दूसरी वरीयता का खेल क्या है?
राज्यसभा चुनाव सामान्य चुनाव की तरह नहीं होता। इसमें विधायक उम्मीदवारों को पहली, दूसरी और तीसरी पसंद देते हैं।
पहले सिर्फ प्रथम वरीयता वोट गिने जाते हैं।
लेकिन यदि कोई उम्मीदवार जरूरी कोटा तक नहीं पहुंचता, तब सबसे पीछे रहने वाले उम्मीदवार के वोट ट्रांसफर होते हैं और उनके बैलेट पर दर्ज दूसरी पसंद गिनी जाती है।
यहीं से पूरा गणित बदल सकता है।
क्यों खास है झारखंड का यह चुनाव?
झारखंड विधानसभा में संख्या का अंतर बहुत बड़ा नहीं है। सत्ता पक्ष के पास बढ़त जरूर है, लेकिन दूसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प माना जा रहा है।
बीजेपी की नजर सिर्फ अपने वोट पर नहीं, बल्कि:
• असंतुष्ट विधायकों,
• क्रॉस वोटिंग,
• निर्दलीयों,
• और दूसरी वरीयता के समीकरण पर भी है।
यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे “साइलेंट स्ट्रेटेजी वाला चुनाव” कह रहे हैं। अब जानते हैं कि आखिर इस बार बिहार मॉडल की चर्चा क्यों हो रही है?
हाल ही में बिहार राज्यसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार पहली वरीयता में पीछे थे, लेकिन दूसरी वरीयता वोट ट्रांसफर होने के बाद जीत गए।
उस चुनाव ने यह साबित कर दिया कि:
“राज्यसभा चुनाव सिर्फ संख्या नहीं, रणनीतिक वोट मैनेजमेंट का खेल है।”
अब बीजेपी झारखंड में भी उसी फॉर्मूले पर काम कर सकती है।
बता दें झारखंड में कुछ विधायक और छोटे दल ऐसे हैं जो किसी एक गठबंधन में पूरी तरह बंधे नहीं माने जाते।
ऐसी स्थिति में:
• उनका प्रथम वरीयता वोट,
• और उससे भी ज्यादा उनकी दूसरी पसंद,
निर्णायक हो सकती है।
इसी वजह से जयराम महतो जैसे नेताओं पर सबकी नजर टिकी हुई है।
बीजेपी की संभावित रणनीति
राजनीतिक जानकारों के अनुसार बीजेपी तीन स्तर पर काम कर सकती है:
1. प्रथम वरीयता वोट सुरक्षित रखना
अपने सभी विधायकों का वोट एकजुट रखना।
2. अतिरिक्त वोट मैनेजमेंट
निर्दलीय या नाराज विधायकों से समर्थन लेना।
3. दूसरी वरीयता का गणित
ऐसे उम्मीदवारों पर नजर रखना जिनके बाहर होने पर उनके वोट बीजेपी उम्मीदवार को ट्रांसफर हो सकें।
चुनाव का असली रोमांच
राज्यसभा चुनाव में कई बार नतीजा मतदान वाले दिन नहीं, बल्कि गिनती के अंतिम चरण में तय होता है।
यदि झारखंड में भी मुकाबला कोटा से नीचे अटकता है, तो दूसरी वरीयता वोट पूरे चुनाव का परिणाम बदल सकते हैं।
और अगर ऐसा हुआ, तो यह चुनाव झारखंड की राजनीति में “बिहार मॉडल” की पहली बड़ी मिसाल बन सकता है।

