
मनोज सुभद्र यादव
जब राजनीति के शिखर पर कोई व्यक्ति पहुंच जाता है, तब उसे सबसे बड़ी चुनौती अपने विरोधियों से नहीं, बल्कि अपने आसपास खड़ी हो जाने वाली चाटुकारों की भीड़ से मिलती है। धीरे-धीरे वह दूर की देखने लगता है पर अपने पैरों के नीचे की ज़मीन देखना बंद कर देता है। फिर वही सुनाई देता है जो मन को अच्छा लगे, वही दिखाई देता है जो प्रशंसा से भरा हो। जो आलोचना करे, उसे विरोधी घोषित कर दिया जाता है।
सारठ की राजनीति में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। शशांक भोक्ता जब सत्ता और पद के शिखर पर थे, तब उनका प्रभाव और ताव दोनों दिखाई देता था। चित्रा और आसपास के पिछड़े, दलित और वंचित तबकों के लोगों से बात कीजिए, आपको कई अनुभव सुनने को मिल जाएंगे। मेरा मानना है कि यह सब हमेशा जानबूझकर नहीं होता। सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति धीरे-धीरे नीचे देखना बंद कर देता है। नतीजा यह होता है कि उसके पैरों तले की ज़मीन खिसकने लगती है और जब सत्ता का आसमान छिन जाता है, तब दोबारा ज़मीन हासिल करना कठिन हो जाता है। फिर एक गलत फैसले को सही साबित करने के लिए कई और गलत फैसले लिए जाते हैं, लेकिन हासिल कुछ नहीं होता।
निस्संदेह आपने धन और संपत्ति अर्जित की होगी, लेकिन जनता से सहज जुड़ाव कभी नहीं बन पाया। वह भाव नहीं आ पाया जिसमें कोई गरीब, पिछड़ा या दलित व्यक्ति आपके सामने बिना झिझक अपनी बात रख सके। खैर, आपने बहुत कुछ पाया, बिना अधिक संघर्ष किए। जिस कहानी का आप हिस्सा बताते हैं, उसके असली नायक अबू तालिब साहब थे; आपने केवल वही किया जो एक चतुर राजनीतिक व्यक्ति कर सकता था।
इसके बाद रणधीर सिंह जी का दौर आया। उन्होंने वर्षों मेहनत की, संघर्ष किया और अंततः विधायक तथा मंत्री बने। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी यह विश्वास हो गया कि वही अंतिम सत्य हैं। जनता को भेड़-बकरी समझना, लोगों को अपमानित करना और गालियाँ देना उनकी राजनीति का हिस्सा बन गया। परिणाम यह हुआ कि उनके कामों से अधिक उनके व्यवहार की चर्चा होने लगी।
इस चुनाव में हेमंत सोरेन जी की पार्टी से चुन्ना सिंह जी मैदान में थे। रणधीर सिंह जी के पास अब भी पिछड़ों का बड़ा वोट बैंक था, क्योंकि चुन्ना सिंह जी की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उनके नाम पर वर्षों तक कुछ लोगों ने पिछड़ों, दलितों और वंचितों का शोषण किया। ऐसे अनेक उदाहरण आज भी मिल जाएंगे। फिर भी कई लोगों ने मेहनत कर पिछड़ों को झामुमो की ओर लाने का प्रयास किया, लेकिन यादव समाज और दलितों के हिस्से को छोड़ दें तो व्यापक समर्थन नहीं मिल सका। यहाँ तक कि भूमिहार समाज का बड़ा हिस्सा भी रणधीर सिंह जी के साथ रहा। मुस्लिम, आदिवासी, दलित, यादव और भाजपा के विरोध में खड़े जागरूक लोगों के समर्थन से चुन्ना सिंह को एक दशक बाद जीत मिली।
यह जीत इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसमें केवल एक उम्मीदवार की नहीं, बल्कि धनबल और राजनीतिक अहंकार की हार हुई। रणधीर सिंह जी का घमंड टूटा। लेकिन अब असली बात। चुनाव के बाद कुछ समय तक सब सामान्य रहा, फिर वही कहानी दोहराई जाने लगी जो पहले भोक्ता और रणधीर सिंह के साथ हुई थी। आलोचक और विरोधी के बीच का अंतर मिटने लगा। दिन-रात चाटुकारों से घिरा नेता धीरे-धीरे अपना कर्तव्य और महत्व दोनों भूल जाता है। उसे लगता है कि जनता की आवाज़ से अधिक महत्वपूर्ण उसके आसपास बैठे कुछ लोगों की राय है।
विडंबना यह है कि जिन लोगों की वजह से एक दशक से अधिक का राजनीतिक वनवास मिला था, आज फिर वही लोग नई सत्ता की ज़मीन खोद रहे हैं। खैर, अगले चुनाव तक तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी। जनता देर से फैसला करती है, लेकिन जब करती है तो उसका फैसला सबसे अंतिम होता है।

