
डेस्क : झारखंड की राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती रही है। यहां कब सियासी तूफान खड़ा हो जाए और कब हालात शांत हो जाएं, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं होता। राज्य की राजनीति में उठापटक अब लगभग एक परंपरा बन चुकी है। इस बार राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र राज्यसभा की दो सीटें हैं, जहां एनडीए और सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन आमने-सामने नजर आ रहे हैं। राज्यसभा चुनाव के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने बैद्यनाथ राम को मैदान में उतारा है और उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस ने प्रणव झा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि तीसरे प्रत्याशी के रूप में निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी चुनावी मैदान में हैं।
परिमल नाथवानी इस मुकाबले के सबसे चर्चित और सबसे संपन्न उम्मीदवार माने जा रहे हैं। उन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त है। भले ही मुकाबला त्रिकोणीय दिखाई दे रहा हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि असली लड़ाई कांग्रेस के प्रणव झा और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के बीच है। राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से आंकड़े इंडिया गठबंधन के पक्ष में नजर आते हैं, लेकिन नाथवानी को अनुभवी और रणनीतिक खिलाड़ी माना जाता है। वे पहले भी झारखंड से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं और राजनीतिक समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं। हाल के दिनों में उनके नामांकन को लेकर कुछ तकनीकी विवाद जरूर खड़ा हुआ था, लेकिन अब वह पूरी तरह खत्म हो चुका है। ऐसे में चुनाव शुरू होने से पहले ही नाथवानी को एक महत्वपूर्ण बढ़त मिलती दिख रही है।
दरअसल, बुधवार को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान परिमल नाथवानी के नाम और हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) से जुड़े कुछ दस्तावेजों पर आपत्तियां उठाई गई थीं। कांग्रेस ने इस मामले में अपने वरिष्ठ नेता और प्रसिद्ध अधिवक्ता सलमान खुर्शीद को भी बुलाया था। हालांकि निर्वाची पदाधिकारी ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों की जांच करने के बाद नाथवानी के नामांकन को वैध करार दिया और उन पर लगा होल्ड हटा दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस ने निर्वाची पदाधिकारी पर नाथवानी और भाजपा को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया। हालांकि चुनावी प्रक्रिया में नामांकन को लेकर उठे विवाद का फिलहाल पटाक्षेप हो चुका है।
अगर विधानसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो इंडिया गठबंधन के पास लगभग 56 वोटों का समर्थन बताया जा रहा है। वहीं निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन हासिल है और उनके पक्ष में 24 विधायकों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। सामान्य परिस्थितियों में यदि दोनों गठबंधन उम्मीदवारों को 28-28 वोट मिलते हैं तो जेएमएम और कांग्रेस के प्रत्याशी आसानी से जीत सकते हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि यदि एक भी वोट इधर-उधर हुआ या क्रॉस वोटिंग हुई तो पूरा गणित बदल सकता है। इतना ही नहीं, अगर किसी एक उम्मीदवार को अपेक्षा से अधिक वोट मिल जाते हैं, तब भी समीकरण बिगड़ सकते हैं।
यही वजह है कि केवल आंकड़ों के भरोसे नतीजों का अनुमान लगाना जोखिम भरा माना जा रहा है। झारखंड के राज्यसभा चुनावों का इतिहास भी ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां हॉर्स ट्रेडिंग, क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक जोड़-तोड़ की चर्चाएं सुर्खियों में रही हैं। ऐसे में यह मान लेना कि इस बार कोई राजनीतिक उलटफेर नहीं होगा, शायद जल्दबाजी होगी। कांग्रेस अपने उम्मीदवार प्रणव झा की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत झोंकती नजर आ रही है। नाथवानी को चुनावी दौड़ से बाहर करने की कोशिश भी हुई, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिल सकी। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि 16 विधायकों वाली कांग्रेस को अपने सहयोगी दलों के समर्थन को लेकर पूरी तरह भरोसा नहीं है। इसी बीच परिमल नाथवानी की मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से हुई मुलाकात ने भी कई तरह की राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया है। हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं।
राज्यसभा की दोनों सीटों पर किसकी जीत होगी, इसका फैसला 18 तारीख को हो जाएगा। लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी परीक्षा कांग्रेस के सामने दिखाई देती है। भाजपा इस चुनाव में सीधे मुकाबले में भले न हो, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम पर उसकी नजर लगातार बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो परिमल नाथवानी को समर्थन देकर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है। यही वजह है कि यह मुकाबला केवल विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नहीं, बल्कि कहीं न कहीं इंडिया गठबंधन के भीतर भी राजनीतिक संतुलन की परीक्षा बन गया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस चुनौतीपूर्ण चुनावी चक्रव्यूह को कैसे पार करती है और क्या अपने उम्मीदवार को जीत दिलाने में सफल हो पाती है या नहीं।

