सचिन श्रीवास्तव

बीते एक सप्ताह से इम्तियाज अली की पीरियड रोमांटिक-ड्रामा मैं वापस आऊंगा देख पाने का सौभाग्य नहीं मिल पा रहा था, और दुनिया के साथ चलने की इस नामालूम दौड में अलग—थलग पडने लगा था। आप समझ सकते हैं कि भीड के साथ न चलने के खतरे क्या हैं! यूं भी इस वक्त सोशल मीडिया पर दो ही समूह हैं, एक जिन्होंने मैं वापस आऊंगा देख ली है और दूसरे जिन्होंने नहीं देखी है। देखने वालों में भी एक वो हैं, जिन्हें यह पसंद आई है, और दूसरे वो जिन्हें इनमें तरकारी की तरह नमक ज्यादा और हल्दी कम लगी है। बहरकैफ, अपन संतत्व की उस अवस्था में हैं, जहां मुक्तिबोध के “जो है उससे कुछ बेहतर चाहिए” के राग को पीछे छोड चुके हैं और इस दौर में जो कुछ थोडा बेहतर सिनेमा भी मिल जाता है, तो चहक उठते हैं। इसीलिए 1947 के बंटवारे की पृष्ठभूमि में प्रेम, विस्थापन और स्मृति की यह कहानी उम्दा लगी। यह सब बातें तो कही ही जा चुकी हैं कि-
— यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं, बल्कि घर, वतन और यादों के खोने की त्रासदी है।
— एआर रहमान का संगीत फिल्म की भावनात्मक परतों को गहरा करता है।
— नसीर साहब ने बहुत ही बढिया अभिनय किया है। युवा कीनू ने भी।
— यह भी दर्ज है कि अगर आपको इम्तियाज अली की रॉकस्टार, तमाशा या बंटवारे पर बनी संवेदनशील फिल्में पसंद हैं, तो यह फिल्म आपको छू सकती है।
— लेकिन इसकी गति थोड़ी धीमी है और लगभग 2 घंटे 46 मिनट लंबी है।
कुल मिलाकर यह मॉस इंटरटेनर कम, और धीरे-धीरे भीतर उतरने वाली फिल्म ज्यादा है। “मैं वापस आउंगा” प्रेम से ज्यादा स्मृति और विस्थापन की फिल्म है, जो एक सवाल पूछती है कि क्या इंसान सचमुच कभी अपने घर वापस लौट पाता है? इन सबके बीच मुझे लगता है कि जो बात नहीं कही गई है वो यह कि यह एक कविता है और कविता अपने समय का मुकम्मल बयान कभी नहीं होती है, वह पूरी तस्वीर के किसी एक हिस्से की गर्द को झाडकर आपके सामने रखती है। जैसे हर बूढ़े घर में एक कमरा होता है जिसे अब कोई इस्तेमाल नहीं करता। वहां धूल बैठती रहती है, लकड़ी पुरानी हो जाती है, दीवारों का चूना उतरने लगता है—लेकिन घर की असली स्मृति वही कमरा बचाकर रखता है। इम्तियाज अली की मैं वापस आऊंगा कुछ वैसी ही फिल्म है।
यह इतिहास की सड़क पर दौड़ती हुई फिल्म नहीं है; यह उस बंद कमरे में रखी चारपाई है, जिस पर कोई बहुत पहले लेटा था और जिसकी सिलवटें अभी तक बची हुई हैं। कई लोगों ने इसे बंटवारे की फिल्म कहा। मुझे नहीं लगता यह बंटवारे की फिल्म है। बंटवारा यहां बाहर नहीं, भीतर होता है। सरहद नक्शे पर बाद में खिंचती है, पहले आदमी की चेतना में। ईशर सिंह की टूटी हुई यादें असल में उसी नक्शे के फटे हुए टुकड़े हैं। हम अकसर इतिहास को एक सीधी सड़क की तरह पढ़ते हैं। लेकिन बूढ़े लोग इतिहास को वैसे नहीं जीते। उनके लिए समय कभी पीछे से आता है, कभी आगे से। कभी एक गंध अचानक चालीस साल खोल देती है। यह फिल्म उसी गंध का सिनेमा है।
जो लोग इससे इतिहास की ठोस रिपोर्ट मांग रहे हैं, वे शायद बारिश से नक्शा बनवाना चाहते हैं। बारिश नक्शा नहीं बनाती, महज मिट्टी को उसकी पुरानी शक्ल याद दिलाती है। वैसे भी इतिहास बड़ा कठोर जीव है। वह प्रेमियों के लिए रास्ता नहीं बदलता। वह रेलगाड़ियों को लाशों से भर देता है और खेतों को सीमा बना देता है। पार्टिशन की कहानियां अकसर इसी कठोरता से पैदा हुई हैं। सदात हसन मंटो के टोबा टेक सिंह के पागलपन की तरह, जो यह तय नहीं कर पाता कि उसका गांव किस तरफ गया। लेकिन नई फिल्मों में इतिहास ने जैसे रूमाल पकड़ लिया है। वह आंसू पोंछता है, चेहरों पर हाथ फेरता है, और कहता है— रो लो, सब ठीक हो जाएगा। यहीं यह सवाल उठता है। क्या हर त्रासदी को प्रेमकथा में बदला जा सकता है? या यह पूंजी का पुराना हुनर है कि वह हर घाव को कमोडिटी बना देती है? मार्क्स ने लिखा था कि पूंजी हर चीज को अपने रूप में बदल देती है। आज लगता है कि दुख भी उसी का माल बन चुका है। पार्टिशन अब अर्काइव नहीं, एस्थेटिक है। उसका खून बैकग्राउंड में टैक्चर बन जाता है, और फोरग्राउंड में प्रेम। शायद यह जरूरी भी है— वरना हम इतने बड़े दुख को सहेंगे कैसे? लेकिन यही खतरा है। जब इतिहास सिर्फ बैकड्राप बन जाए, तब ट्रेजडी धीरे-धीरे वॉलपेपर में बदल जाती है।
एक समय था जब लोग फिल्म देखकर रोते थे और चुपचाप घर लौट जाते थे। अब लोग रोते हुए कैमरा ऑन कर लेते हैं। आंसू अब निजी नहीं रहे। वे पोस्ट हो चुके हैं। इम्तियाज अली ने जब उन रोते हुए दर्शकों की स्टोरी शेयर की, तो मुझे लगा— यह महज फिल्म का प्रचार नहीं है, यह हमारे समय की नई भावनात्मक अर्थव्यवस्था है। अब दुख सिर्फ महसूस नहीं किया जाता, सर्कुलेट भी किया जाता है। नई पीढ़ी ने दुख को मीम बना दिया है और प्रेम को पंचलाइन। निरवैर का स्टैंड अप कॉमेडी उसी पीढ़ी की भाषा है। वे इतिहास को सीधे नहीं छूते। पहले उसके ऊपर मजाक करते हैं, ताकि उसकी गर्मी कम हो जाए। यह कायरता नहीं, सर्वाइवल है। हर पीढ़ी अपने जख्म ढकने का तरीका चुनती है। पुरानी पीढ़ी चुप रहती थी। नई पीढ़ी जोक मारती है। और दोनों के बीच सच्चाई कहीं बीच में पड़ी रहती है— ठीक वैसे जैसे किसी पुरानी फिल्म के इंटरवल में खाली सीटें। शायद यही इस फिल्म का सबसे बड़ा रूपक है— हम अब प्रेम भी करते हैं, रोते भी हैं, और उसी वक्त उसे रिकॉर्ड भी करते हैं।
इतिहास अब मेमोरी नहीं, मीडिया है। कई लोगों ने इस फिल्म के साथ क्रिस्टोफर नोलान की डंक्रिक की याद दिलाई है, और यह तुलना यूं ही नहीं है। नोलन समय को आर्किटेक्चर की तरह बनाते हैं— एक सप्ताह, एक दिन, एक घंटा और तीनों एक साथ चलते हैं। इम्तियाज यहां इतना जटिल ढांचा नहीं बनाते, लेकिन वे समय को स्मृति की तरह बहने देते हैं। अंतर यह है कि नोलन का समय मैकेनिकल है, इम्तियाज का आर्गेनिक। नोलन की घड़ी टिक-टिक करती है। इम्तियाज की घड़ी बीच-बीच में रुक जाती है। और शायद यही इस फिल्म का सबसे सुंदर पक्ष है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी इसी स्मृति-व्याकरण का विस्तार है। प्री—पार्टिशन सरगोधा के दृश्य वॉर्म टोन में हैं— पीले, मिट्टी जैसे, धूप से भरे हुए। यह महज सुंदरता नहीं है; यह खोए हुए घर की तपती-स्मृति है। दूसरी ओर वर्तमान की दुनिया नीली, धूसर, ठंडी है। जैसे जीवन से रंग धीरे-धीरे उतर गए हों। कई बार कैमरा दरवाजों और खिड़कियों के फ्रेम में पात्रों को कैद करता है। यह एक सीधा विजुअल मेटाफर है— जैसे हर पात्र किसी न किसी समय-कोठरी में बंद है। ईशर अतीत में कैद हैं। निरवैर वर्तमान में फंसा है। और जिया-कीनू भविष्य से कटे हुए प्रेमी हैं। दरवाजे यहां रास्ते नहीं, सीमाएं हैं। और यह सीमा महज भारत-पाकिस्तान की नहीं है। यह स्मृति और विस्मृति की सीमा है।
फिल्म के प्रेम को लेकर भी बहस है। कुछ लोगों को यह बहुत मासूम और मार्मिक लगा, कुछ को बनावटी। सच यह है कि इम्तियाज का प्रेम हमेशा इतिहास के बाहर नहीं, इतिहास की दरारों में जन्म लेता है। हाइवे में मुक्ति हिंसा के भीतर से आती है, तमाशा में पहचान प्रेम के भीतर से टूटती है, और यहां प्रेम बंटवारे की राख में उगता है। लेकिन यह प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं है। मार्क्सवादी नजर से देखें तो यह दिलचस्प है कि फिल्म कलेक्टिव हिस्ट्री को इंडीविजुअल मेमोरी में बदल देती है। इतिहास का बड़ा हिंसक पहिया—औपनिवेशिक सत्ता, सांप्रदायिक उन्माद, विस्थापन—इन सबको फिल्म पूरी तरह फोरग्राउंड में नहीं लाती। वह उन्हें बैकग्राउंउ में रखती है और फोरग्राउंड में लॉगिंग रखती है। यह उसकी ताकत भी है और उसकी सीमा भी। ताकत इसलिए कि इससे ट्रेजडी निजी हो जाती है। सीमा इसलिए कि इतिहास की भौतिकता कहीं धुंधली पड़ जाती है। लेकिन शायद इम्तियाज का सवाल इतिहास का पुनर्निर्माण नहीं, उसके बाद बची हुई भावनाओं का पुनर्पाठ है। और यहीं फिल्म नई पीढ़ी से जुड़ती है।
एआर रहमान का संगीत यहां अपनी उंचाई पर नहीं है, लेकिन उसकी रेस्ट्रेंट उल्लेखनीय है। रहमान यहां शोर नहीं करते। वे खामोशी के किनारों पर चलते हैं। कई बार परिंदों की आवाज, दूर की हवा, हल्की सरसराहट—ये सब बैकग्राउंड स्कोर से ज्यादा असर पैदा करते हैं। यानी फिल्म सुनाई कम देती है, महसूस ज्यादा होती है। यही कारण है कि मैं वापस आऊंगा को या तो आप बहुत प्रेम करेंगे या बहुत अस्वीकार। यह बीच का अनुभव नहीं देती। क्योंकि यह इतिहास को दस्तावेज की तरह नहीं, सपने की तरह बरतती है। और सपनों की सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है— वे सच नहीं होते, लेकिन सच से ज्यादा देर तक हमारे भीतर टिके रहते हैं। शायद इसीलिए यह फिल्म मुझे किसी पुरानी चारपाई की तरह याद रह गई— जिस पर अब कोई नहीं सोता, लेकिन जिसके धंसे हुए बीच में किसी अनुपस्थित शरीर की गर्मी अब भी बाकी है।
एक बात ओर-सिनेमा जब इतिहास को छूता है तो उससे महज संवेदना नहीं, जवाबदेही भी मांगी जाती है। यहीं मैं वापस आऊंगा एक मुश्किल जगह पर खड़ी होती है। क्योंकि यह बंटवारे की कथा कहने का दावा करती है, लेकिन बंटवारे के मटेरियल ट्रूथ की बजाय उसकी इमोशनल रीसिड्यू में ज्यादा दिलचस्पी रखती है। यानी वह खून नहीं दिखाती, उसकी गंध दिखाती है। कई लोग कहेंगे कि यही तो कला है— जो प्रत्यक्ष नहीं, उसका संकेत। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर ऐतिहासिक त्रासदी को संकेतों में बदला जा सकता है? टोबा टेक सिंह में मंटो ने पागलपन के भीतर इतिहास की सबसे तीखी आलोचना रखी थी। वहां बंटवारा किसी प्रेमी की निजी तकलीफ नहीं था; वह पूरी सभ्यता की विफलता था। इसी तरह पिंजर में स्त्री का शरीर ही इतिहास का रणक्षेत्र बन जाता है। वहां प्रेम नहीं, स्वामित्व की हिंसा है। वहां लॉगिंग नहीं डिसपोजेशन है। इम्तियाज का रास्ता अलग है। यह चुनाव महज एस्थेटिक नहीं, पॉलिटिकल भी है। वैसे भी इतिहास भावनाओं से नहीं, भौतिक शक्तियों से बनता है। औपनिवेशिक सत्ता, पूंजी का पुनर्गठन, धार्मिक पहचान की राजनीतिक मोबलाइजेशन—बंटवारा इन सबका परिणाम था। लेकिन फिल्म में ये सारी संरचनाएं लगभग गायब हैं।
जैसे किसी कारखाने का धुआं दिखे, मशीनें नहीं। यहां प्रेम है, दर्द है, जुदाई है— लेकिन वह पूरी व्यवस्था, जिसने यह सब पैदा किया, धुंध में छिपी रहती है। और यह धुंध सिर्फ सिनेमाई नहीं, वैचारिक भी है। और अंत में इम्तियाज इतिहास की अदालत में नहीं बैठे। वे मैमोरी के कमरे में बैठे हैं। और मैमोरी हमेशा सलेक्टिव होती है। एक बूढ़ा आदमी जब अपने गांव को याद करता है, तो उसे सत्ता के दस्तावेज नहीं याद आते। उसे किसी पेड़ की छांव याद आती है, किसी लड़की की हंसी, किसी दरवाजे का रंग। यानी इतिहास की बड़ी मशीन के भीतर आदमी अपने छोटे फ्रेगमेंट बचाकर रखता है। ईशर सिंह की चेतना में वही फ्रेगमेंट हैं। इसलिए फिल्म का सच अर्काइवल नहीं, इमोशनल है। और इसीलिए यह फिल्म महज सिनेमा नहीं, कविता है। क्योंकि मैं वापस आऊंगा की कमियां साफ दिखती हैं, लेकिन उसकी नीयत भी साफ दिखती है। और इस दौर में, जब सिनेमा का बड़ा हिस्सा नफरत की पटकथा लिख रहा है, प्रेम को इतिहास के बीच रख देना भी एक तरह का प्रतिरोध है। बस इतना भर कि इतिहास रूमाल नहीं होता। वह आंसू पोंछने के लिए नहीं, कभी-कभी उन्हें पैदा करने के लिए आता है।


