बचरा: शिक्षक केवल पढ़ाने का काम नहीं करते, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, विचार और भविष्य को भी आकार देते हैं। एक आदर्श शिक्षक में कौन-कौन से गुण होने चाहिए और अध्यापन को प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है? इन सवालों पर चर्चा के लिए 12 अक्टूबर 2026 को डीएवी पब्लिक स्कूल, बचरा के तत्वावधान में शिक्षकों के हित में ‘आदर्श शिक्षक की कसौटी और अध्यापन कला’ विषय पर एक दिवसीय विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पांडेय ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि एक आदर्श शिक्षक में सात गुणों का होना अनिवार्य है। उन्होंने ज्ञान, व्यवहार, अनुशासन और विद्यार्थियों के साथ संवाद को शिक्षक की सफलता का आधार बताया।
डॉ. पांडेय ने अपने संबोधन में नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि संसार में सात ऐसे स्थान हैं, जहां निमंत्रण मिलने पर भी नहीं जाना चाहिए। यदि वहां चले जाएं, तो ठहरना नहीं चाहिए और यदि ठहरना पड़ जाए, तो किसी से उसका जिक्र नहीं करना चाहिए। ये स्थान हैं-वेश्यालय, मदिरालय, जुआलय, हिंसालय, न्यायालय, चिकित्सालय और नरकालय। उनके अनुसार, इन स्थानों पर जाने से मनुष्य को यश नहीं मिलता। इसलिए ऐसे सात वर्जित स्थानों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

इसके विपरीत उन्होंने सात ऐसे स्थानों का भी जिक्र किया, जहां बिना बुलाए भी जाना चाहिए, वहां ठहरना चाहिए और पूछे जाने पर गर्व से बताना चाहिए। ये स्थान हैं—विद्यालय, पुस्तकालय, अनाथालय, शिक्षकालय, सत्संगालय, देवालय और स्वर्गालय। डॉ. पांडेय ने कहा कि इन स्थानों पर जाने से व्यक्ति को यश और सम्मान मिलता है।
उन्होंने कहा कि देश का दुर्भाग्य है कि आज लोग उन जगहों पर जाने से कतराते हैं, जहां जाना चाहिए, जबकि उन स्थानों पर बिना बुलाए पहुंच जाते हैं, जहां जाने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा, “यही कारण है कि यहां आकर मुझे आनंद की अनुभूति हो रही है। मैं आप सभी का हार्दिक नमन, वंदन और अभिनंदन करता हूं।”
डॉ. पांडेय ने भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में ज्ञान की प्राप्ति सर्वोपरि है। ज्ञान हासिल करने के लिए श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय-निग्रह बेहद जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि मनुष्य की दस इंद्रियां होती हैं, जिनमें पांच कर्मेंद्रियां-हाथ, पैर, मुंह, लिंग और गुदा तथा पांच ज्ञानेंद्रियां-आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि आंख से देखने, कान से सुनने, मुंह से खाने, जीभ से स्वाद लेने और त्वचा से स्पर्श का अनुभव प्राप्त होता है। शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श इंद्रियों के विषय हैं। ये इंद्रियां हमेशा सर्वोत्तम की ओर आकर्षित होती हैं। ऐसे में मन को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।
मन को नियंत्रित करने और ज्ञान प्राप्त करने का सूत्र समझाते हुए उन्होंने कहा कि ‘मन’ शब्द के आगे ‘न’ लगाने से ‘नमन’ और पीछे ‘न’ लगाने से ‘मनन’ बनता है। उनके अनुसार, नमन और मनन का मेल ही ज्ञान, सफलता और कामयाबी का मार्ग प्रशस्त करता है। इस अवसर पर डॉ. पांडेय ने जीवन में माता-पिता के सम्मान और उनके प्रति समर्पण का महत्व बताते हुए ये पंक्तियां भी सुनाईं-
“सुखी उम्मीदों की कोई डाली नहीं होती,
बंद किस्मत की कोई ताली नहीं होती।
झुक जाए जो मां-बाप के चरणों में,
उसकी झोली कभी खाली नहीं होती।”
इसके बाद उन्होंने शिक्षकों को आदर्श शिक्षक के सात गुणों का महत्व समझाया। उन्होंने संस्कृत में कहा-
“विद्वत्वं, दक्षता शीलं, संक्रांति: अनुशीलम्।
शिक्षकस्य गुणा: सप्त:, सचेतस्त्वमं, प्रसन्नता:।”
इसका अर्थ समझाते हुए उन्होंने बताया कि एक आदर्श शिक्षक में विद्वत्ता यानी जानकारी, दक्षता यानी समझदारी, शील यानी अच्छे आचार-विचार और संस्कार, संक्रांति यानी प्रभावी संप्रेषण, अनुशीलन यानी निरंतर अभ्यास, सचेतस्त्व यानी जागरूकता और प्रसन्नता यानी खुशमिजाज स्वभाव होना चाहिए। उनके अनुसार, यही सात गुण किसी शिक्षक को आदर्श बनाते हैं।
डॉ. पांडेय ने महाकवि कालिदास के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ शिक्षकों में विषय को अनुभव करने की क्षमता अधिक होती है, जबकि कुछ अपनी बात को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में कुशल होते हैं। लेकिन श्रेष्ठ शिक्षक वही हैं, जिनमें अनुभव और अभिव्यक्ति, दोनों का सुंदर मेल हो। इस संदर्भ में उन्होंने संस्कृत की ये पंक्तियां प्रस्तुत कीं-
“श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था,
संक्रांतिन्यस्त विशेष युक्ता:।
यस्योभयं साधु: स: शिक्षकाणाम्,
धुरि प्रतिष्ठा पवितव्य एव।”
उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों में विषय की गहरी अनुभूति और उसे प्रभावी ढंग से विद्यार्थियों तक पहुंचाने की क्षमता, दोनों मौजूद होती हैं, वही भविष्य में प्रतिष्ठा और सम्मान के शिखर तक पहुंचते हैं। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय, डॉ. आभा खन्ना और डॉ. जय गोविन्द मन्नु ने भी अपने विचार रखे। उनके संबोधन से संगोष्ठी का महत्व और बढ़ गया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विद्यालय के प्राचार्य डॉ. साहिल ठाकरान ने कहा कि एक आदर्श शिक्षक के व्यक्तित्व में अच्छे आचार, विचार और संस्कार का होना बेहद जरूरी है। उन्होंने नमन और वंदन के महत्व को बताते हुए संस्कृत का यह श्लोक प्रस्तुत किया-
“अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥”
इसका अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि बड़ों के प्रति सम्मान और नियमित अभिवादन से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। इस विशेष आयोजन में विद्यालय के लगभग सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत से लेकर समापन तक शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी बनी रही। सभी ने व्याख्यान में रुचि दिखाई और आदर्श शिक्षक की भूमिका से जुड़े विचारों को गंभीरता से सुना।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. जे.बी. पांडेय ने उत्कृष्ट आयोजन के लिए प्राचार्य डॉ. साहिल ठाकरान, डॉ. आभा खन्ना, एस.के. पांडेय, हिंदी शिक्षक धर्म प्रकाश मिश्र और चंदन कुमार को ‘हिंदी रत्न सम्मान’ एवं ‘श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान’ से सम्मानित किया। उपस्थित शिक्षकों ने करतल ध्वनि के साथ इस पहल का स्वागत किया। आगत अतिथियों का भव्य स्वागत किया गया। अंत में राष्ट्रगान और शांति पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस आयोजन ने शिक्षकों को अपने कर्तव्यों, व्यवहार और अध्यापन शैली पर विचार करने का अवसर दिया।


