
शिवानंद तिवारी
नौजवानों में जो उथल-पुथल है, बदलाव की जो आकांक्षा दिखाई दे रही है, वह बहुत तीव्र है। इतना ही नहीं, उसका प्रभाव अब स्कूली बच्चों तक में दिखाई देने लगा है। अभी हमने देखा कि एक स्कूल के बच्चों ने स्कूल प्रबंधन और वहाँ की अव्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाज़ी की और धरना दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि स्कूल प्रशासन को लिखित आश्वासन देना पड़ा कि अमुक तिथि तक पंखे लग जाएंगे, बाथरूम की सफाई और मरम्मत हो जाएगी तथा अन्य आवश्यक व्यवस्था पूरी कर दी जाएगी। यह इस बात का संकेत है कि बदलाव की इच्छा समाज के सबसे निचले स्तर तक पहुँच चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि बदलाव होगा कैसे? इसके मूल में जाने की ज़रूरत है। केवल सरकार बदल जाने से सब कुछ नहीं बदल जाता। 1977 में भी सरकार बदली थी। उस समय भी लोगों में भारी उम्मीद थी, लेकिन उसके बाद क्या हुआ, यह सबने देखा है।
यही नहीं, देश को आज़ादी मिलने के तुरंत बाद बिहार के एक बड़े और लोकप्रिय नेता सूरज नारायण सिंह ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर पूछा था कि यह कैसी आज़ादी है? उस समय उनके इलाके, विशेषकर मिथिला के क्षेत्र में, भुखमरी की स्थिति थी। महंगाई आसमान छू रही थी. लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल रहा था। जब लोगों ने इसके खिलाफ जुलूस निकाला और अपनी बात प्रशासन तक पहुँचाने की कोशिश की, तो पुलिस ने उन पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया। उसी पीड़ा में उन्होंने गांधी जी से सवाल किया था कि अगर जनता पर वही अत्याचार जारी है, तो यह कैसी आज़ादी है?
मुझे एक घटना याद आती है। 1964 में जब मैं जेल गया था, तब वहाँ रेल आंदोलन के तीन-चार नेता पहले से बंद थे। उनमें से एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी नौकरी अंग्रेज़ों के समय रेलवे में लगी थी। मैंने उनसे पूछा कि जब देश आज़ाद हुआ था, तब लोगों के बीच माहौल कैसा था? उन्होंने बताया कि पूरे देश में उत्सव जैसा वातावरण था। होली और दीपावली जैसा उल्लास था। लोगों को लग रहा था कि अब एक नया युग शुरू होगा। लेकिन उन्होंने कहा कि यह उत्साह बहुत जल्दी समाप्त हो गया। मैंने पूछा, ऐसा क्यों हुआ? उनका जवाब था कि जब अंग्रेज़ों के खिलाफ हम आंदोलन करते थे, तब जिस दरोगा की लाठी हम पर पड़ती थी, आज़ादी के बाद भी वही दरोगा उसी थाने में बैठा मिला। जो कलक्टर, जो एसपी या पूरा प्रशासन जो अंग्रेज़ों के शासन में जनता का दमन करता था, वही प्रशासन उसी रूप में काम करता रहा। सत्ता बदल गई, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। इसलिए धीरे-धीरे आज़ादी का उत्साह और उसका खुमार उतरता चला गया। आज भी लगभग वही स्थिति दिखाई देती है। इसलिए केवल सत्ता परिवर्तन से काम नहीं चलेगा। पुराने अनुभवों से सीख लेकर व्यवस्था में परिवर्तन पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
हमें इस बात की खुशी है कि 1974 के आंदोलन में हम लोगों ने सक्रिय भागीदारी की थी। लेकिन आज जो स्थिति दिखाई दे रही है, वह उससे भी आगे की है। आज के नौजवानों में जो चेतना और समझ हम देख रहे हैं वह बिहार आंदोलन में नहीं थी. बल्कि मैं कह सकता हूँ कि अगर जयप्रकाश जी नेतृत्व की भूमिका में नहीं होते तो वह आंदोलन हुआ ही नहीं होता. समय के साथ जागरूकता बढ़ी है, समझ बढ़ी है और संचार के साधनों में अभूतपूर्व बदलाव आया है. इसलिए आश्चर्यजनक रूप से आंदोलन की जो व्यापकता और विस्तार हम देख रहे हैं इसके पीछे इन बदलावों की बड़ी भूमिका है. यह भावना अब पूरे देश में फैलती जा रही है।
इसलिए अगर सरकार यह सोचती है कि दमन के बल पर इस आंदोलन या इस चेतना को दबा देगी, तो फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है । लेकिन इसके साथ-साथ एक गंभीर विचार भी चलना चाहिए कि बदलाव किस प्रकार का हो। अगर केवल चेहरे बदलेंगे और पूरी व्यवस्था उसी पुराने ढंग से चलती रहेगी, तो कुछ समय बाद इस बदलाव का प्रभाव भी समाप्त हो जाएगा जैसा पहले हमने देखा है और जनता फिर उसी निराशा में लौट जाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि आज सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात पर गहराई से विचार करने की है कि अंग्रेज़ों के समय से चली आ रही प्रशासनिक व्यवस्था में क्या बुनियादी परिवर्तन किए जाएँ। जब तक व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक केवल सत्ता परिवर्तन से समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला है।
लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद और राजद के उपाध्यक्ष हैं।

