धूमिल की खंडित प्रतिमा और हथौड़े की हार

वाराणसी के खेवली गांव में कवि धूमिल की प्रतिमा तोड़े जाने पर साहित्य जगत में आक्रोश। लेख में धूमिल की कविता, विचारधारा और लोकतांत्रिक चेतना को याद किया गया।

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धूमिल भाषा में आदमी होने की ज़िद का नाम है। धूमिल कविता के मुहावरे को तोड़ने वाले कारीगर का नाम है। धूमिल साहित्य के आभिजात्य से जूझते ग़ैर-समझौतापरस्त संवाद का नाम है जहां शब्दों की कोई वर्जना नहीं है। धूमिल शब्दों को खोलकर रखने वाले अनंत विद्रोही का नाम है। वे कविता में वर्जित शब्दावली का प्रयोग करते हैं। अपने समय की विसंगतियों को तेज़ छुरी जैसी भाषा देते हैं। हिंदी में कोई सगुण का सिद्ध है तो कोई निर्गुण का। किसी के पास छायावाद है तो किसी के पास प्रगतिगामिता। लेकिन धूमिल के पास है आम आदमी. कविता में अंधेरे को और उसमें जुते आम आदमी को धूमिल सामने ला खड़ा करते हैं और समय का नायक घोषित कर देते हैं। धूमिल साहस के सॉंचे में ढले आदमकद इस्पात का नाम है। कुछ अज्ञात लोगों ने बनारस के खेवली गॉंव में स्थापित धूमिल की प्रतिमा तोड़ दी है। उन्हें नहीं पता कि प्रतिमा तोड़ने से धूमिल, वैचारिकी से धूमिल नहीं होंगे। क्योंकि धूमिल मरणधर्मा अमरत्व का नाम हैं। धूमिल…. तुलसी,कबीर,प्रसाद की चली आ रही बनारस की काव्य परंपरा का भी एक नाम हैं।

जब मुझे पता चला कि बनारस में किसी ने धूमिल की प्रतिमा तोड़ दी तो पहले दुख हुआ। फिर बनारस की चिंता हुई. फिर उन लोगों पर तरस आया जिन्होंने यह ओछा कृत्य किया। उन्हें शायद लगता होगा कि किसी कवि की प्रतिमा तोड़ देने से उसका प्रभाव भी टूट जाता है। यह भ्रम नया नहीं है। इतिहास में हर वह आदमी जिसने विचार से डर महसूस किया, उसने सबसे पहले किताब जलाई, मूर्ति तोड़ी या लेखक को चुप कराने की कोशिश की। लेकिन इतिहास की एक आदत है। वह हथौड़ों को नहीं, विचारों को याद रखता है। विचार न हथौड़े से मरता है, न क़ैद से डरता है, और पलटकर उसी ज़ालिम पर हंसता है जिसके हाथ में हथौड़ा है। इसलिए सुकरात और गांधी दोनों ज़िंदा हैं।
हथौड़े की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि उसे हर चीज़ पत्थर की दिखाई देती है। वह समझता है कि सामने जो दिख रहा है, वही असली दुश्मन है. इसलिए वह प्रतिमा पर वार करता है। उसे यह समझ नहीं आता कि जिस कवि से वह लड़ रहा है, वह तो बहुत पहले पत्थर से निकलकर भाषा में बस चुका है। हथौड़े कभी विचारों को नहीं तोड़ते। वे सिर्फ़ यह साबित करते हैं कि तर्क हार चुका है। जब संवाद समाप्त होता है, तब हिंसा शुरू होती है। और जब किसी समाज को अपने कवियों से डर लगने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसे कविता से नहीं, अपने ही समय से डर लगने लगा है। प्रतिमाएं विचारों का पता होती हैं, विचार नहीं। विचार पत्थर में नहीं रहते. वे भाषा में रहते हैं. वे स्मृति में रहते हैं। वे उस बेचैनी में रहते हैं जो किसी ईमानदार इंसान को अपने समय से सवाल पूछने के लिए मजबूर करती है।

धूमिल की मूर्ति का तोड़ा जाना चिंताजनक तो है ही, समाज के लिए लज्जाजनक भी है। धूमिल भारतीय संस्कृति की सामुहिक प्रतिरोधी चेतना के कवि हैं। धूमिल की जनपक्षधरता आम आदमी के आक्रोश, असहमति और विरोध को आवाज़ देती है। उन्होंने कविता को कभी फूलों की क्यारी नहीं बनने दिया। उन्होंने उसे अदालत में खड़ा किया. सड़क पर उतारा। संसद के दरवाज़े तक ले गए। उन्होंने कविता को सुंदर होने से पहले ज़रूरी बनाया। इसलिए उनकी एक पंक्ति पूरी हिंदी कविता का घोषणापत्र बन गई- “कविता का मतलब है भाषा में आदमी होना”। इस एक वाक्य में धूमिल की पूरी दुनिया समाई हुई है। वे भाषा में आदमी खोजते थे. आज हम भाषा में समर्थक और विरोधी खोज रहे हैं. उनकी कविता “प्रौढ़ शिक्षा” की पंक्तियाँ याद आती हैं—
“गीली मिट्टी की तरह हां-हां मत करो
तनो
अकड़ो
अमरबेल की तरह मत जियो
जड़ पकड़ो
बदलो—अपने आपको बदलो
दुनिया बदल रही है”
यही धूमिल हैं। वे कविता नहीं पढ़ाते, नागरिक बनाते हैं. उन हथौड़ाबुद्धियों को शायद न पता हो कि धूमिल का जन्म सुदामा पांडेय के रूप में हुआ, उन्हें हिंदी ने ‘धूमिल’ नाम इसलिए नहीं दिया कि वे अँधेरे के कवि थे। वे इसलिए धूमिल थे क्योंकि उन्होंने हमारे समय की धुँध में छिपे हुए धूमिल चेहरों को पहचान लिया था। उन्होंने उन जगहों पर रोशनी डाली जहां लोकतंत्र अपने सबसे चमकीले भाषणों के बावजूद अंधेरा छोड़ देता है। समाज, लोकतंत्र और मर्यादा के पीछे के अंधकार को देख पाने का कौशल था उनके पास और वो इस अंधेरे को न केवल पहचानते थे बल्कि लोगों के सामने भी ला खड़ा करते थे। यही कारण है कि धूमिल को पढ़ना हमेशा आसान नहीं रहा। वे आपको सहमत होने का सुख नहीं देते. वे आपको असहज होने की सज़ा देते हैं। उनकी कविता ‘मोचीराम’ में एक साधारण मोची अचानक इस देश का सबसे बड़ा दार्शनिक बन जाता है. वह कहता है-
“मेरी निगाह में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है. मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है, जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है”
उनकी जनपक्षधरता देख लोग उन्हें वामपंथी समझने लगते हैं. वह यह भ्रम तोड़ते हैं अपनी मशहूर कविता ‘नक्सलबाड़ी’में लिखते हैं-
“यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी
दाएँ हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुजर जाती है मगर शौच के बाद
सिर्फ बायाँ हाथ से धोता है”
धूमिल भाषा में कोई वर्जना मंज़ूर नहीं करते। वे कहते है-छायावाद के कवि शब्दों को तोल कर रखते थे। प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे। नई कविता के कवि शब्दों को गोल कर रखते थे। सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।
धूमिल जानते थे कि लोकतंत्र की असली मरम्मत संसद से कम, समाज में ज़्यादा होती है। वे आदमी को उसकी जाति से नहीं, उसके फटे हुए जूते से पहचानते थे। क्योंकि फटा हुआ जूता कभी झूठ नहीं बोलता। फिर उन्होंने एक और सवाल पूछा। इतना सीधा कि आज भी उसका जवाब नहीं मिला।
एक आदमी
रोटी बेलता है।
एक आदमी
रोटी खाता है।
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है,
न रोटी खाता है।
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है।
मैं पूछता हूँ—
“यह तीसरा आदमी कौन है?”
मेरे देश की संसद मौन है।
ध्यान से देखिए। धूमिल संसद के खिलाफ बात नहीं कर रहे. वे संसद का मौन तोड़ना चाहते हैं। यही फ़र्क़ है एक अराजकतावादी और एक सच्चे लोकतांत्रिक में। धूमिल लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नहीं थे। वे लोकतंत्र के भीतर पैदा हो गई उस चुप्पी के ख़िलाफ़ थे जो आदमी की भूख, अपमान और असमानता को सामान्य मान लेती है। धूमिल का पहला काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ कविता की नई ज़मीन तोड़ता था। उनका दूसरा संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ उनकी मौत के बाद छपा। इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। तीसरा संग्रह था ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र’. उनकी कविता ‘पटकथा’ पढ़नी चाहिए। लगेगा जैसे आज सुबह लिखी गई हो। उनकी डायरी पढ़िए। लगेगा जैसे आज के अख़बार पर टिप्पणी कर रहे हों। उनकी कविताओं में गांव है, शहर है, अदालत है, थाना है, किसान है, मज़दूर है, संसद है लेकिन सबसे ऊपर आदमी है। वही आदमी जो उनकी कविता का नायक भी है और लोकतंत्र का असली मालिक भी।

यही वजह है कि धूमिल आज भी असुविधाजनक हैं। सुविधाजनक कवियों की प्रतिमाएँ नहीं तोड़ी जातीं। ख़तरनाक कवियों की तोड़ी जाती हैं। जो व्यवस्था की भाषा बोलते हैं, उन्हें सम्मान मिल जाता है। जो व्यवस्था से सवाल पूछते हैं, उनसे पीढ़ियों तक हिसाब लिया जाता है। लेकिन इतिहास का फैसला हमेशा देर से आता है। ग़रीबी की भाषिक सम्पन्नता में जीने वाले धूमिल की दुनिया में करछुल बटलोई से बतियाती है। चिमटा तवे से मचलता है। चूल्हा कुछ नहीं बोलता। जलता और बस जलता रहता है। वहॉं पहले थाली खाती है फिर आदमी रोटी खाता है। विद्रोही तेवर, भाषा, भावभूमि, कथ्य और अपने शिल्पगत प्रयोगों में धूमिल अपने समकालीन रचनाकारों से अलग और बेजोड़ हैं।

आज कबीर बचे हुए हैं, उनके विरोधी नहीं। निराला बचे हुए हैं, उनके आलोचक नहीं। प्रेमचंद बचे हुए हैं, उन्हें प्रतिबंधित करने वाले नहीं। धूमिल भी बचेंगे। क्योंकि पत्थर की उम्र सीमित होती है। लेकिन विचार तो अनंत है। हां, प्रतिमा फिर लगनी चाहिए। तोड़ी गयी प्रतिमा आवक्ष्य थी अब आदमकद लगनी चाहिए। सरकार को पहल करनी चाहिए। हिन्दी समाज को भी आगे आना चाहिए। दोषियों को सज़ा मिले। कानून अपना काम करे। लेकिन इससे भी ज़रूरी काम समाज का है। धूमिल को फिर से पढ़ा जाए। स्कूलों में पढ़ा जाए। विश्वविद्यालयों में पढ़ा जाए। चाय की दुकानों पर पढ़ा जाए। संसद में पढ़ा जाए। क्योंकि धूमिल की प्रतिमा की सबसे अच्छी सुरक्षा पुलिस नहीं करेगी। उन्हें पढ़ने वाली पीढ़ियां करेंगी।

कवि तब नहीं मरते जब उनकी मूर्तियां टूटती हैं। कवि तब मरते हैं जब समाज कविताओं को पढ़ना और कविताओं के सवाल पूछना छोड़ देता है। और जिस दिन इस देश का आख़िरी आदमी भी यह पूछना बंद कर देगा “यह तीसरा आदमी कौन है?” उस दिन सिर्फ़ धूमिल नहीं मरेंगे। उस दिन हमारे लोकतंत्र की भाषा से आदमी शब्द ग़ायब हो जाएगा। और शायद धूमिल की सबसे बड़ी चिंता भी यही थी।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।