दिशोम गुरु शिबू सोरेन : संघर्ष की आग से जन्मा एक युगपुरुष

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर उनके संघर्ष, झारखंड आंदोलन, आदिवासी अधिकारों और जनसेवा की विरासत को याद करते हुए युवाओं के लिए प्रेरणादायक संदेश।

4 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

लक्ष्मीनारायण मुंडा

आज दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि है। 4 अगस्त 2025 को जब वे हमसे विदा हुए तो केवल एक नेता नही गया—एक पूरा युग चला गया। वह युग जिसमें एक गरीब आदिवासी युवक ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को सामूहिक मुक्ति का संकल्प बना डाला। आज उनके संघर्ष और त्याग को याद करना केवल श्रद्धांजलि नही,बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है,जो कठिनाइयों के सामने हार मान लेते हैं। शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ। बचपन नाम था शिवचरण मांझी। पिता सोबरन सोरेन स्कूल शिक्षक थे और महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाते थे। 27 नवंबर 1957 को सूदखोरों ने उनकी हत्या कर दी। उस समय शिबू महज 13 वर्ष के थे। पिता की लाश देखकर जो आग उनके अंदर भड़की, उसने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी। उसने पढ़ाई छोड़ दी। किशोर उम्र में ही महाजनों और जमीन हड़पने वालों के खिलाफ खड़े हो गए। आदिवासियों की जमीनें कर्ज के नाम पर छिनी जा रही थीं। लोग अपनी ही जमीन पर मजदूर बनकर रह गए थे। शिबू सोरेन ने ‘धनकटनी आंदोलन’ शुरु किया—जिसमें आदिवासी अपनी छिनी हुई फसल खुद काट लेते। यह आंदोलन केवल फसल काटने का नही था। यह आत्मसम्मान वापस लेने का आंदोलन था।

वे जंगलों में छिपते,पहाड़ियों की गुफाओं में रातें बिताते,पुलिस की नजरों से बचते हुए गांव-गांव घूमते रहते थे। लोगों को जागरुक करते, संगठन बनाते। पहले सोनत संताल समाज,फिर 1972-73 में बिनोद बिहारी महतो और ए.के. रॉय के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी। तीर-धनुष पार्टी का प्रतीक बना—क्योंकि उन्होंने पारंपरिक हथियारों को ही प्रतिरोध का प्रतीक बनाया। जरा सोचिए उसके जीवन में कितना त्याग था? युवावस्था का सुख,सुरक्षा,परिवार का सुख—सब कुछ आंदोलन की वेदी पर चढ़ा दिया। कई मुकदमे, गिरफ्तारी के वारंट,भूमिगत जीवन। फिर भी वे नही रुके। क्योंकि उनके लिए यह व्यक्तिगत बदला नही था—यह पूरी आदिवासी जाति की मुक्ति का सवाल था। दिकुओं (बाहरी शोषकों) के खिलाफ लड़ाई को उन्होंने झारखंड राज्य की मांग से जोड़ दिया। दशकों की मेहनत, धरना-प्रदर्शन, जेल-यात्रा और की बार के राजनीतिक समझौतों के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य अस्तित्व में आया। जिस सपने को उन्होंने देखा था,वह साकार हुआ। तीन बार मुख्यमंत्री बने,केंद्रीय मंत्री बने,लेकिन सत्ता उनके लिए कभी लक्ष्य नही रही। वे हमेशा ‘दिशोम गुरु’—भूमि के गुरु—ही बने रहे। सादगी उनका स्वभाव थी। सत्ता के गलियारों में भी वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

उनके जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?

कभी संघर्ष करने से मत डरो। अपनी व्यक्तिगत त्रासदी को सामूहिक शक्ति में बदलो। जब व्यवस्था अन्याय करती है,तो चुप मत बैठो। शिक्षा, संसाधन और समर्थन न हो तो भी दृढ़ संकल्प से रास्ता बना लो। शिबू सोरेन ने दिखाया कि एक आम आदिवासी युवक भी इतिहास लिख सकता है,यदि उसकी मंशा साफ हो और इरादा पक्का हो। आज जब झारखंड उनके सपनों का राज्य है,तब उनकी पुण्यतिथि पर हमें केवल फूल चढ़ाने नही,बल्कि उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने की जरुरत है—आदिवासी अधिकार, भूमि सुरक्षा,शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन। दिशोम गुरु का सबसे बड़ा श्रद्धांजलि यही होगा कि हम उनकी तरह अन्याय के खिलाफ खड़े हों और संघर्ष को कभी न छोड़ें। शिबू सोरेन चले गए,लेकिन उनकी संघर्ष की लौ अब भी जल रही है। उस लौ से हर युवा अपने अंदर की आग जलाए। क्योंकि गुरुजी ने सिखाया—सच के लिए लड़ना कभी व्यर्थ नही जाता है।

Share This Article
विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।