
नई दिल्ली : भारतीय सेना आने वाले वर्षों में अपनी सप्लाई व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रही है। दुर्गम पहाड़ों, बर्फ से ढकी अग्रिम चौकियों और सीमावर्ती इलाकों तक अब राशन, दवाइयां, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए हजारों लॉजिस्टिक्स ड्रोन तैनात किए जाएंगे। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने करीब 2,715 लॉजिस्टिक्स ड्रोन खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए भारतीय कंपनियों से प्रस्ताव मांगे गए हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और अन्य संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में तेज, सुरक्षित और निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करना सेना की प्राथमिकता बन चुका है। यदि यह योजना तय समय पर पूरी होती है तो भारतीय सेना की रसद प्रणाली (Military Logistics) में पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव माना जाएगा।
क्या है रक्षा मंत्रालय की नई योजना ?
रक्षा मंत्रालय ने रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (Request for Information-RFI) जारी की है। रक्षा खरीद प्रक्रिया में यह पहला औपचारिक चरण होता है। इसके माध्यम से मंत्रालय यह जानना चाहता है कि भारतीय उद्योग ऐसी तकनीक विकसित करने और बड़ी संख्या में उपलब्ध कराने में कितना सक्षम है। RFI भारतीय सेना के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कैपेबिलिटी डेवलपमेंट की ओर से जारी की गई है। इसके तहत तीन अलग-अलग ऊंचाई पर काम करने वाले लॉजिस्टिक्स ड्रोन की मांग की गई है। ‘लास्ट माइल लॉजिस्टिक्स’ आखिर क्या है ?
रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन ड्रोन का उपयोग लास्ट माइल लॉजिस्टिक्स के लिए होगा। इसका मतलब है कि किसी सैन्य सामग्री को बेस कैंप तक पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन वहां से अंतिम चौकी या पोस्ट तक पहुंचाना सबसे कठिन चरण होता है। यही अंतिम चरण “लास्ट माइल” कहलाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी पोस्ट तक सड़क नहीं जाती या वहां हेलीकॉप्टर उतरना संभव नहीं है, तो ड्रोन सीधे वहां सामान पहुंचा सकते हैं। किन इलाकों में सबसे ज्यादा उपयोगी होंगे ?
इन ड्रोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से
• लद्दाख
• पूर्वी लद्दाख
• अरुणाचल प्रदेश
• सिक्किम
• उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्र
• ऊंची हिमालयी चौकियां
• रेगिस्तानी सीमा क्षेत्र
• जंगलों में स्थित सैन्य पोस्ट
जैसे इलाकों में किया जा सकेगा। युद्ध के अलावा प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी इनका उपयोग किया जा सकता है।
ड्रोन में कौन-कौन सी आधुनिक तकनीक होगी ?
सेना ने तकनीकी मानकों को काफी ऊंचा रखा है।
इनमें शामिल हैं :
नेविगेशन
• GPS
• रूस का GLONASS
• भारत की स्वदेशी NavIC प्रणाली
निगरानी उपकरण
• हाई रिजॉल्यूशन डे कैमरा
• थर्मल नाइट कैमरा
• वीडियो ट्रांसमिशन सिस्टम
• ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन
सुरक्षा
• इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से सुरक्षा
• स्पूफिंग से सुरक्षा
• ऑटोमैटिक रिटर्न-टू-होम
• मैनुअल और ऑटोनॉमस उड़ान
पहचान प्रणाली
इन ड्रोन में ऐसी पहचान प्रणाली होगी जिससे भारतीय सेना के अपने एयर डिफेंस सिस्टम इन्हें दुश्मन के ड्रोन या विमान न समझें।
कैसा होगा इनका प्रदर्शन ?
रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट मानक तय किए हैं।
ड्रोन :
• 50 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी में काम करें।
• -30 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड में भी उड़ान भर सकें।
• बिना विकसित रनवे या हेलीपैड के उड़ान भर सकें।
• कम से कम 1,000 बार सुरक्षित लैंडिंग कर सकें।
• न्यूनतम सात वर्ष तक सेवा दे सकें।
• केवल 2-3 सैनिकों की टीम इन्हें संचालित कर सके।
क्या हेलीकॉप्टरों की जगह ले लेंगे ये ड्रोन ?
पूरी तरह नहीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारी हथियार, बड़े सैन्य वाहन या बड़ी मात्रा में रसद पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टरों की भूमिका बनी रहेगी। हालांकि छोटे और मध्यम वजन के सामान की नियमित सप्लाई में ड्रोन बड़ी भूमिका निभाएंगे। इससे हेलीकॉप्टरों का उपयोग केवल महत्वपूर्ण अभियानों तक सीमित किया जा सकेगा।
युद्ध के दौरान कितने उपयोगी होंगे ?
आधुनिक युद्धों में सप्लाई चेन किसी भी सेना की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। यदि सड़कें नष्ट हो जाएं। पुल उड़ जाएं, दुश्मन लगातार गोलाबारी कर रहा हो तो पारंपरिक सप्लाई बाधित हो सकती है। ऐसी स्थिति में ड्रोन अपेक्षाकृत सुरक्षित तरीके से सैनिकों तक आवश्यक सामग्री पहुंचा सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध सहित हाल के कई संघर्षों में ड्रोन की उपयोगिता दुनिया ने देखी है। अब भारतीय सेना भी लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में इस तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना चाहती है।
‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी मिलेगा बढ़ावा
इस परियोजना की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि रक्षा मंत्रालय ने भारतीय कंपनियों से जानकारी मांगी है। इसका मतलब है कि सरकार रक्षा उत्पादन में घरेलू उद्योग को प्राथमिकता देना चाहती है। यदि बड़े पैमाने पर इन ड्रोन का निर्माण भारत में होता है तो स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूती मिलेगी। नई तकनीक विकसित होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे औा भविष्य में निर्यात की संभावनाएं भी बन सकती हैं। अभी खरीद नहीं हुई, आगे क्या होगा ?
RFI जारी होने का मतलब यह नहीं कि खरीद पूरी हो गई है।
अब आगे की प्रक्रिया में
• उद्योग से प्राप्त जवाबों का अध्ययन,
• तकनीकी आवश्यकताओं को अंतिम रूप देना,
• Request for Proposal (RFP) जारी करना,
• फील्ड ट्रायल,
• तकनीकी मूल्यांकन,
• कीमत का आकलन,
• अनुबंध पर हस्ताक्षर
जैसे कई चरण पूरे होंगे।
क्या बदल जाएगी सेना की रसद व्यवस्था?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स प्रणाली में बड़ा बदलाव आएगा। इससे—
• अग्रिम चौकियों तक सप्लाई का समय घटेगा।
• सैनिकों का जोखिम कम होगा।
• खराब मौसम में भी रसद पहुंचाना आसान होगा।
• हेलीकॉप्टरों पर निर्भरता कम होगी।
• सीमाओं पर सेना की परिचालन क्षमता (Operational Readiness) और तेजी से बढ़ेगी।
सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए समय पर रसद पहुंचाना किसी भी सैन्य अभियान की सफलता का आधार होता है। ऐसे में 2,715 लॉजिस्टिक्स ड्रोन खरीदने की यह योजना केवल एक खरीद नहीं, बल्कि भारतीय सेना की भविष्य की युद्ध और सप्लाई रणनीति में बड़ा बदलाव मानी जा रही है।

