हर साल 13 अगस्त को World Organ Donation Day मनाया जाता है। इसका उद्देश्य अंगदान के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इससे जुड़े भ्रम दूर करना है। किडनी, हृदय, लिवर, फेफड़े और अग्न्याशय जैसे अंगों का प्रत्यारोपण गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवन की नई उम्मीद बन सकता है।

अंगदान आखिर क्या है?
अंगदान में व्यक्ति की सहमति के बाद उसके स्वस्थ अंगों को चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रिया के तहत जरूरतमंद मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है। अंगदान जीवित व्यक्ति भी कर सकता है और मृत्यु के बाद भी अंगदान संभव है। दान की पात्रता स्वास्थ्य और चिकित्सकीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
1954 में हुई थी बड़ी शुरुआत
अंग प्रत्यारोपण के इतिहास में वर्ष 1954 महत्वपूर्ण माना जाता है। रोनाल्ड ली हेरिक ने अपने जुड़वां भाई को अपनी एक किडनी दान की थी। डॉक्टर जोसेफ मरे ने इस सफल प्रत्यारोपण को अंजाम दिया। अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 1990 में फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला।
भारत में अंगदान दिवस कब मनाया जाता है?
भारत में राष्ट्रीय अंगदान दिवस की तारीख में बदलाव हुआ है। वर्ष 2010 से इसे 27 नवंबर को मनाया जाता था। 2023 से भारत में अंगदान दिवस 3 अगस्त को मनाया जाने लगा। यह तारीख देश के पहले सफल मृतक-दाता हृदय प्रत्यारोपण की वर्षगांठ से जुड़ी है, जो 3 अगस्त 1994 को हुआ था।
अंगदान के कितने प्रकार हैं?
अंगदान मुख्य रूप से जीवित दान और मृतक दान दो प्रकार का होता है। जीवित व्यक्ति चिकित्सकीय मानकों के अनुसार एक किडनी या लिवर का कुछ हिस्सा दान कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों को जरूरतमंद मरीजों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्यों जरूरी है अंगदान?
अंग विफलता से जूझ रहे कई मरीजों के लिए प्रत्यारोपण जीवन बचाने वाला उपचार हो सकता है। जागरूकता की कमी और अंगों की उपलब्धता सीमित होने के कारण जरूरतमंद मरीजों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अंगदान के बारे में सही जानकारी लोगों को मिथकों से बाहर निकलने और समझदारी से निर्णय लेने में मदद करती है।


