डॉ विकास कुमार :

लगभग एक वर्ष पहले सदर अस्पताल में न्यूरोसर्जरी ज्वाइन की। शुरुआत के दिनों में ओपीडी कम थी, केस भी कम आते थे। वहीं से सदर अस्पताल में न्यूरोसर्जरी सेवाओं को आगे बढ़ाने का सफर शुरू हुआ।
राह आसान नहीं थी—सीमित संसाधन, कई व्यावहारिक चुनौतियाँ और शुरुआत में यह एहसास भी कि जितना समय और मेहनत यहाँ लग रही है, उतना ही समय निजी क्षेत्र में लगाया जाए तो आर्थिक लाभ शायद कहीं अधिक हो सकता है।
लेकिन धीरे-धीरे काम आगे बढ़ता गया।
इस दौरान ब्रेन ट्रॉमा, स्पाइन ट्रॉमा, ब्रेन ट्यूमर, सर्वाइकल एवं लम्बर स्पाइन, स्पाइनल ट्यूमर तथा अन्य जटिल न्यूरोसर्जिकल सर्जरी करने का अवसर मिला। पिछले एक वर्ष में हम लोगों ने 250+ ब्रेन एवं स्पाइन सर्जरी आयुष्मान योजना के तहत की हैं। OPD भी शुरुआती लगभग 20–25 मरीज प्रतिदिन से बढ़कर अब कई दिनों में 70+ मरीजों तक पहुँच जाती है।
हर केस अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आया और हर चुनौती ने हमें कुछ नया सीखने, व्यवस्था को बेहतर करने और एक कदम आगे बढ़ने का अवसर दिया।
इस पूरे सफर में रांची के सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार सर एवं सदर अस्पताल के डिप्टी सुप्रिटेंडेंट डॉ. बिमलेश सिंह का सहयोग और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहा। इसके लिए हृदय से आभार।
साथ ही, हमारे सहयोगी न्यूरोसर्जन डॉ. विवेक बॉस एवं डॉ. अशोक बॉस का निरंतर सहयोग भी इस सफर की सफलता में बेहद महत्वपूर्ण रहा।
यह सफर हम सबके सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
इस दौरान अक्सर अपने वरिष्ठों की बातें याद आती हैं। डॉ. अनिल कुमार सर और डॉ. सीबी सहाय सर बताते हैं कि जब उन्होंने रिम्स में न्यूरोसर्जरी को आगे बढ़ाना शुरू किया था, तब शुरुआत में हर तरह के केस वहाँ नहीं आते थे। धीरे-धीरे केस लेना शुरू किया, चुनौतियों को स्वीकार किया, एक-एक कदम आगे बढ़े और वर्षों की मेहनत से आज रिम्स की न्यूरोसर्जरी जिस मुकाम पर है, वह हम सभी के लिए प्रेरणा है।
शायद किसी भी संस्थान का विकास इसी तरह होता है—एक दिन में नहीं, एक साल में नहीं, बल्कि हर चुनौती को स्वीकार करते हुए लगातार काम करने से।
उसी सोच के साथ मेरा भी प्रयास है कि राँची सदर अस्पताल में न्यूरोसर्जरी को धीरे-धीरे एक ऐसे स्तर तक विकसित किया जाए, जहाँ झारखंड के जरूरतमंद मरीजों को अधिक से अधिक जटिल ब्रेन एवं स्पाइन सर्जरी की सुविधा सरकारी संस्थान में ही मिल सके।
निजी क्षेत्र में काम करके अधिक कमाई करना निश्चित रूप से एक विकल्प है। लेकिन सरकारी संस्थान में सीमित संसाधनों के बीच किसी जरूरतमंद मरीज को वह सर्जरी उपलब्ध करा पाना, जिसकी उसे आवश्यकता है—उस संतोष की तुलना किसी आर्थिक लाभ से करना मुश्किल है।
यह अभी मंज़िल नहीं, एक शुरुआत है।


