कभी जीविका के लिए गैराज में काम करते थे गुलजार, बाद में चमका किस्मत का सितारा

Archana Ekka
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कभी जिस लड़के को घर में लिखते हुए देखकर डांट पड़ती थी, वही आगे चलकर करोड़ों दिलों की आवाज़ बन गया। जिस हाथ में कभी कारों के रंग मिलाने का काम था, उसी हाथ ने बाद में ऐसे शब्द लिखे, जिन्हें हिंदी सिनेमा ने अमर कर दिया। यह कहानी सिर्फ गुलज़ार की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस लड़के की कहानी है, जिसने बंटवारे का दर्द देखा, अपनों से दूरियां देखीं और आर्थिक संघर्ष झेला। फिर भी उसने अपनी कलम को कभी अपने से दूर नहीं होने दिया। 18 अगस्त को गुलज़ार का जन्मदिन है। इसलिए उनके जीवन के उस सफर को फिर से देखना जरूरी है, जहां शोहरत बहुत बाद में आई। पहले आया था संघर्ष, अकेलापन और लिखने की जिद।

जिस बच्चे को लिखने पर डांट पड़ती थी, वही आगे चलकर शब्दों का जादूगर बना

गुलज़ार का जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के झेलम जिले के दीना गांव में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। उनका जन्म नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा था। बचपन से ही साहित्य और शब्दों के प्रति उनका आकर्षण अलग था। मगर परिवार की परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि लेखन को करियर माना जा सके। उनके परिवार की प्राथमिकता रोजी-रोटी थी। ऐसे माहौल में लिखने का जुनून आसान नहीं था। बताया जाता है कि जब वह घर में लिखने की कोशिश करते, तो पिता और परिवार के दूसरे सदस्य उन्हें इस रास्ते से दूर रहने की सलाह देते। कई बार डांट भी पड़ती। मगर शायद यही विरोध उनकी जिद को और मजबूत करता गया। जब घर में लिखने की जगह नहीं मिली, तो वह पड़ोसी के घर जाकर लिखने का अभ्यास करते थे। सोचिए, जिस बच्चे को अपनी कविताओं के लिए घर में जगह नहीं मिल रही थी, वही एक दिन पूरे देश के दिल में जगह बनाने वाला था।

फिर आया 1947, जिसने सिर्फ घर नहीं बदला, जिंदगी की दिशा भी बदल दी

गुलज़ार के जीवन को समझने के लिए 1947 को समझना जरूरी है। देश का बंटवारा हुआ और लाखों परिवारों की तरह उनका परिवार भी विस्थापित हुआ। उनका परिवार भारत आ गया। अमृतसर और फिर दिल्ली का जीवन उनके सामने था। एक तरफ पढ़ाई और साहित्य का आकर्षण था। दूसरी तरफ परिवार और भविष्य की चिंता थी। बंटवारे की पीड़ा उनके भीतर कहीं गहराई तक बैठ गई। बाद के वर्षों में उनकी रचनाओं में बिछड़ना, दूरी, स्मृति और रिश्तों की नाजुकता बार-बार दिखाई दी। शायद इसलिए उनके शब्द सिर्फ लिखे हुए शब्द नहीं लगते। उनमें जीवन की देखी हुई सच्चाई महसूस होती है। गुलज़ार की संवेदना केवल कल्पना से पैदा नहीं हुई थी। उसके पीछे एक ऐसा बचपन था, जिसने बहुत कुछ खोते हुए देखा था।

दिल्ली से मुंबई तक का सफर, जहां सपने थे लेकिन जेब खाली थी

पढ़ाई के बाद जिंदगी उन्हें मुंबई ले आई। उस समय मुंबई आज की तरह चमकती फिल्मी दुनिया नहीं थी। संघर्ष करने वालों के लिए यह शहर कठोर भी था। गुलज़ार को भी शुरुआत में अपनी रोजी-रोटी के लिए छोटे-मोटे काम करने पड़े। वह एक गैराज में काम करते थे। वहां दुर्घटनाग्रस्त कारों की डेंटिंग के बाद उनके रंगों को मिलाने का काम किया जाता था। यह सुनकर शायद किसी को यकीन न हो कि आगे चलकर रंगों और भावनाओं से शब्दों की दुनिया सजाने वाला यह शायर कभी कारों के रंग मिलाता था। लेकिन यही संघर्ष उनकी कहानी को असाधारण बनाता है। नौकरी के बीच भी किताबें उनके साथ रहती थीं। खाली समय मिला तो पढ़ना शुरू किया। पढ़ते-पढ़ते लिखना शुरू किया। और लिखते-लिखते उनका अपना साहित्यिक संसार बनने लगा।

गैराज में काम करते हुए भी कलम से रिश्ता नहीं टूटा

मुंबई में संघर्ष के दिनों में उनके पास पैसा कम था, लेकिन शब्दों की दुनिया बहुत बड़ी थी। साहित्य उनके लिए केवल शौक नहीं था। वह धीरे-धीरे उनकी पहचान बन रहा था। इसी दौरान उनका संपर्क साहित्यिक और प्रगतिशील लेखकों के वातावरण से हुआ। सिनेमा की दुनिया भी उनके सामने खुलने लगी। मगर उन्होंने केवल फिल्मी गीत लिखने को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। उनके भीतर कवि भी था, कहानीकार भी था और पटकथा लेखक भी। यही वजह है कि बाद में उनके लिखे गीतों में कविता दिखाई दी। संवादों में साहित्य दिखाई दिया। और फिल्मों में मानवीय रिश्तों की गहराई दिखाई दी।

एक मुलाकात ने बदल दिया रास्ता, और सामने आया बिमल रॉय का संसार

मुंबई में उनकी प्रतिभा को पहचानने वालों में शैलेन्द्र जैसे बड़े नाम भी शामिल थे। इसके बाद उनका संपर्क महान फिल्मकार बिमल रॉय से हुआ। यही मुलाकात उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। गुलज़ार ने बिमल रॉय के साथ काम करना शुरू किया। वह फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने लगे। उन्होंने सहायक के रूप में काम किया और फिल्म की दुनिया को अंदर से समझा। फिर 1963 में बिमल रॉय की फिल्म ‘बंदिनी’ आई। इसी फिल्म से बतौर गीतकार उनकी पहचान मजबूत हुई। उनके लिखे गीत ने साबित कर दिया कि फिल्मों में गीत केवल मनोरंजन नहीं होते। वे कहानी के भाव को भी आगे बढ़ा सकते हैं। यहीं से सम्पूर्ण सिंह कालरा का सफर गुलज़ार की पहचान की तरफ बढ़ गया।

लेकिन ‘गुलज़ार’ नाम आया कहां से?

यह सवाल भी उनकी कहानी को और दिलचस्प बना देता है। उनका असली नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा था। लेखन की दुनिया में उन्होंने गुलज़ार नाम अपनाया। शुरुआती दौर में उनका नाम गुलज़ार दीनवी के रूप में भी सामने आया। बाद में दीनवी हट गया और सिर्फ गुलज़ार रह गया। ‘गुलज़ार’ शब्द का अर्थ भी बेहद खूबसूरत है। यह फूलों से भरे बाग की कल्पना जगाता है। शायद यह नाम उनके व्यक्तित्व पर भी बिल्कुल फिट बैठता है। उनकी भाषा में भी फूलों जैसी कोमलता है। मगर उसी भाषा में दर्द की चुभन भी है। यही विरोधाभास उन्हें बाकी लेखकों से अलग बनाता है।

फिर गीत आए, जो सिर्फ सुने नहीं गए, महसूस किए गए

गुलज़ार ने हिंदी सिनेमा को ऐसे गीत दिए, जिनमें रिश्तों की जटिलता भी थी और जिंदगी की सच्चाई भी। ‘तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी’ में शिकायत से ज्यादा आत्ममंथन है। ‘तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’ में प्रेम और अधूरेपन की पूरी कहानी है। ‘आने वाला पल जाने वाला है’ समय की क्षणभंगुरता को बेहद सरल शब्दों में सामने रखता है। वहीं ‘मुसाफिर हूं यारों’ जिंदगी को एक सफर की तरह देखने का नजरिया देता है। बाद के दौर में ‘चप्पा चप्पा चरखा चले’, ‘बीड़ी जलाइले’ और ‘नमक इश्क का’ जैसे गीतों ने यह भी साबित किया कि गुलज़ार केवल गंभीर और भावुक गीतों तक सीमित नहीं थे। वह भाषा, लय और लोकधुनों के साथ भी उतनी ही सहजता से खेल सकते थे।

गुलज़ार सिर्फ गीतकार नहीं बने, उन्होंने कैमरे के पीछे भी अपनी दुनिया बनाई

1960 के दशक में गीतकार के रूप में पहचान बनाने के बाद उनका रचनात्मक सफर यहीं नहीं रुका। 1971 में उन्होंने ‘मेरे अपने’ के साथ निर्देशन की दुनिया में कदम रखा। इसके बाद ‘परिचय’, ‘कोशिश’, ‘अचानक’, ‘आंधी’, ‘खुशबू’, ‘मौसम’, ‘किनारा’, ‘किताब’, ‘अंगूर’, ‘नमकीन’, ‘इजाज़त’, ‘लिबास’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों से उन्होंने अपनी अलग सिनेमाई भाषा बनाई। उनकी फिल्मों में अक्सर रिश्ते सबसे बड़े किरदार बन जाते हैं। प्रेम दिखाई देता है, मगर केवल रोमांस के रूप में नहीं। अकेलापन दिखाई देता है, मगर केवल दुख के रूप में नहीं। उनके सिनेमा में इंसान अपनी कमजोरियों और उलझनों के साथ दिखाई देता है।

निजी जिंदगी में भी एक अधूरी कहानी साथ चलती रही

गुलज़ार की निजी जिंदगी भी हमेशा चर्चा में रही। 1973 में उनकी शादी अभिनेत्री राखी से हुई। दोनों की एक बेटी है, मेघना गुलज़ार, जो आगे चलकर सफल फिल्म निर्देशक बनीं। हालांकि गुलज़ार और राखी बाद में अलग रहने लगे। उनके रिश्ते और अलगाव को लेकर वर्षों तक कई चर्चाएं होती रहीं। मगर गुलज़ार ने अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक तमाशा बनाने से हमेशा दूरी रखी। शायद यही कारण है कि उनकी निजी जिंदगी के कई पहलू आज भी रहस्य की तरह महसूस होते हैं।

जिस कलम को कभी रोकने की कोशिश हुई, वही कलम दुनिया तक पहुंची

गुलज़ार की उपलब्धियों की सूची इतनी लंबी है कि उसे केवल फिल्मी पुरस्कारों से नहीं मापा जा सकता। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार जैसे सम्मान मिले। 2009 में ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के गीत ‘जय हो’ के लिए उन्हें ऑस्कर मिला। अगले वर्ष इसी गीत के लिए उन्हें ग्रैमी पुरस्कार भी मिला।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद पुरस्कारों की अलमारियों में नहीं है। वह उन लोगों की यादों में है, जिन्होंने उनके शब्दों में अपनी जिंदगी देखी। किसी को उनके गीत में अपना अधूरा प्रेम मिला। किसी को अपनी मां की याद मिली। किसी को बिछड़ने का दर्द मिला। किसी को जिंदगी का अकेलापन समझ आया। और किसी ने उनके शब्दों में खुद को पहली बार पहचाना।

आखिर गुलज़ार की कहानी हमें क्या बताती है?

गुलज़ार की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि एक गैराज में काम करने वाला व्यक्ति ऑस्कर तक पहुंच गया। असली कहानी यह है कि परिस्थितियों ने उन्हें बार-बार दूसरी दिशा में धकेला। मगर उन्होंने अपनी कलम को नहीं छोड़ा। घर में डांट मिली तो पड़ोसी के यहां लिखे। आर्थिक जरूरत आई तो गैराज में काम किया। बंटवारे ने जिंदगी बदली तो अनुभवों को शब्दों में बदल दिया। फिल्मी दुनिया में रास्ता मिला तो कविता को सिनेमा से जोड़ दिया। और जब सफलता मिली, तब भी शब्दों के साथ उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ।

आज गुलज़ार को सिर्फ गीतकार कहना उनकी पूरी यात्रा को छोटा कर देना होगा। वह कवि हैं। लेखक हैं। शायर हैं। पटकथा लेखक हैं। निर्देशक हैं। और सबसे बढ़कर वह उन भावनाओं के लेखक हैं, जिन्हें अक्सर इंसान महसूस तो करता है, लेकिन शब्द नहीं दे पाता।

शायद यही वजह है कि गुलज़ार के शब्द पुराने नहीं होते। समय बदलता है। संगीत बदलता है। सिनेमा बदलता है। लेकिन इंसान का अकेलापन, उसका प्रेम, उसका इंतजार और उसकी यादें नहीं बदलतीं। इसलिए गुलज़ार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
जिस लड़के को कभी लिखने के लिए डांट मिली थी, उसने आखिरकार पूरी पीढ़ियों को लिखने, सोचने और महसूस करने का हुनर सिखा दिया। यही गुलज़ार की असली कहानी है। यही उनकी सबसे खूबसूरत जीत भी है।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।