हर मतदाता को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि उसके नाम, उम्र, पते या पारिवारिक विवरण में ठीक किस स्थान पर गड़बड़ी पाई गई?

Archana Ekka
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शीतल पी सिंह

एसआइआर के नाम पर देश की मतदाता सूची सुधारी जा रही है या करोड़ों नागरिकों को पहले संदिग्ध बनाकर उनसे अपना मताधिकार वापस माँगने को कहा जा रहा है? दिल्ली में करीब 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं। कारण बताए गए हैं—“logical discrepancy”, नाम या माता-पिता के विवरण में अंतर अथवा 2002 की मतदाता सूची से नाम का मिलान न होना। सवाल है कि “logical discrepancy” आखिर कैसी विसंगति है? हर मतदाता को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि उसके नाम, उम्र, पते या पारिवारिक विवरण में ठीक किस स्थान पर गड़बड़ी पाई गई?

इन नोटिसों की चपेट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू, विदेश सचिव विक्रम मिसरी, CBI निदेशक और दूसरे बड़े अधिकारी तक आ गए। जिन लोगों की पहचान और सरकारी रिकॉर्ड पर शायद ही किसी को संदेह हो सकता है, उन्हें भी चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर संदिग्ध बता रहा है। तब झुग्गी में रहने वाला मजदूर, किरायेदार, प्रवासी, बुजुर्ग महिला, यौनकर्मी, बेघर नागरिक और अनपढ़ गरीब स्वयं को कैसे बचाएगा?

यह चिंता काल्पनिक नहीं है। SIR पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार चली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग का व्यवहार बताता है कि पारदर्शिता और मतदाता-सुविधा के सामान्य उपाय भी उसने प्रायः अदालत के हस्तक्षेप के बाद स्वीकार किए।
जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से कहा था कि निर्धारित 11 दस्तावेजों के अतिरिक्त आधार, मतदाता पहचान-पत्र और राशन कार्ड पर भी विचार किया जाए। आधार को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का प्रश्न अदालत के सामने 10 जुलाई, 28 जुलाई, 14 अगस्त और 22 अगस्त को अलग-अलग रूप में उठा। लेकिन चुनाव आयोग आधार को औपचारिक रूप से अपनी सूची में शामिल करने से बचता रहा। अंततः 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट आदेश देना पड़ा कि आधार नागरिकता का प्रमाण भले न हो, लेकिन पहचान सिद्ध करने वाला वैध बारहवाँ दस्तावेज माना जाए। उसके बाद आयोग ने अपने अधिकारियों को इसे स्वीकार करने का निर्देश दिया।

सवाल है—जिस आधार का उपयोग सरकार बैंक खाते, राशन, पेंशन, मोबाइल, छात्रवृत्ति और लगभग हर सरकारी सेवा में पहचान के लिए करती है, उसे मतदाता की पहचान के लिए स्वीकार करने में चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहने और अंततः औपचारिक आदेश देने तक इंतजार क्यों करना पड़ा? दूसरा प्रसंग बिहार के करीब 65 लाख मतदाताओं का है, जिनके नाम मसौदा सूची में नहीं आए थे। चुनाव आयोग ने इन नामों और उनके बाहर होने के कारणों को सार्वजनिक करने की मांग का अदालत में विरोध किया और कहा कि ऐसा करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है। तब सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को आदेश दिया कि जिला और बूथवार searchable सूची वेबसाइट पर डाली जाए, प्रत्येक नाम के सामने मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरा पंजीकरण या अन्य वास्तविक कारण बताया जाए और इसकी व्यापक जानकारी अखबार, टीवी, रेडियो तथा स्थानीय कार्यालयों के माध्यम से दी जाए।

अदालत को यह तक कहना पड़ा कि मतदाता अपना नाम कटने का कारण जानने के लिए किसी राजनीतिक दल के स्थानीय कार्यकर्ता के पीछे क्यों भागे? यदि “पूनम देवी” का नाम हटाया गया है तो पूनम देवी को सीधे पता चलना चाहिए कि उनका नाम क्यों हटाया गया। आज दिल्ली में फिर वही समस्या सामने है। लाखों लोगों को “logical discrepancy” जैसे अस्पष्ट शब्दों में नोटिस दिए गए हैं और सुप्रीम कोर्ट में फिर याचिका लगानी पड़ी है कि नोटिस पाने वालों की सूची, नोटिस का सटीक कारण और इस्तेमाल किए गए मापदंड या algorithm सार्वजनिक किए जाएँ। बिहार में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित पारदर्शिता के सिद्धांत को दिल्ली में SIR शुरू करते समय स्वतः लागू क्यों नहीं किया गया? नागरिक को हर राज्य में वही अधिकार पाने के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट क्यों जाना पड़े?

अब पश्चिम बंगाल का अनुभव देखिए। विश्वास के गंभीर संकट के कारण सुप्रीम कोर्ट को लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों से करीब 60 लाख चिह्नित मतदाताओं की पात्रता का निर्णय करवाना पड़ा। फिर 10 मार्च को अदालत ने प्रभावित नागरिकों के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने का आदेश दिया। अदालत ने अत्यावश्यक मामलों को प्राथमिकता से सुनने को भी कहा।
लेकिन परिणाम क्या हुआ? 38.20 लाख से अधिक अपीलों में से लगभग 37.18 लाख अब भी लंबित बताई जा रही हैं। पाँच महीने में केवल करीब 1.02 लाख मामलों का निपटारा हुआ। चुनाव आयोग अब अदालत से 19 ट्रिब्यूनलों को बढ़ाकर 42 करने की अनुमति माँग रहा है। यह जरूरत चुनाव से पहले क्यों नहीं समझी गई? अपील का अधिकार कागज पर दे देना पर्याप्त है, यदि अपील का फैसला आने तक नागरिक कई चुनावों में वोट ही न डाल पाए?

अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से स्पष्ट रूप से पूछा था कि कितनी अपीलें नाम जोड़ने के लिए हैं, कितनी नाम काटने के लिए और कितनों का निस्तारण हुआ। इसके बाद दाखिल हलफनामे में भी शुरुआत में इसका पूरा और साफ वर्गीकरण नहीं दिया गया। बाद में सामने आया कि हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22.21 लाख—लगभग 82 प्रतिशत—ने अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील की थी। इससे भी गंभीर तथ्य यह है कि अब तक जिन हटाए गए मतदाताओं की अपीलों का निर्णय हुआ, उनमें करीब 93 प्रतिशत अपना दावा सही सिद्ध करके सूची में लौट आए। यह अनुपात केवल निस्तारित मामलों का है, सभी अपीलों का नहीं; फिर भी यह प्रारंभिक deletion प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि इतनी बड़ी संख्या में मतदाता अपील में सही निकल रहे हैं, तो गलती नागरिक की थी या उसे संदिग्ध बनाने वाले सिस्टम की?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भी हो गया। चुनाव से पहले केवल 1,607 मतदाताओं के नाम वापस जोड़े जा सके। लाखों अपीलें मतदान के समय लंबित रहीं। वर्षों बाद किसी नागरिक का नाम वापस भी आ जाए तो वह उस चुनाव में छीन लिया गया अपना वोट कहाँ डालेगा? उसके मताधिकार की भरपाई कौन करेगा? सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 के अंतिम निर्णय में SIR कराने की चुनाव आयोग की शक्ति को वैध माना है। इस तथ्य को छिपाने की जरूरत नहीं। लेकिन उसी फैसले में दर्ज है कि मतदाता-सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण उपाय—हटाए गए नाम और कारण सार्वजनिक करना, आधार को पहचान के दस्तावेज के रूप में स्वीकार करना, मतदाताओं की सहायता और अपील की व्यवस्था—अदालत के अंतरिम हस्तक्षेप के बाद लागू हुए।
इसलिए प्रश्न SIR की कानूनी शक्ति का ही नहीं, उसके क्रियान्वयन का भी है। कानून की वैधता प्रशासन की हर कार्रवाई को अपने-आप निष्पक्ष नहीं बना देती।

चुनाव आयोग कहता है कि नोटिस का अर्थ नाम काटना नहीं है और किसी को सुनवाई के बिना नहीं हटाया जाएगा। ठीक है, लेकिन नोटिस लाखों में हों, कारण अस्पष्ट हों और नागरिक को पुराने दस्तावेज लेकर सरकारी कार्यालयों में उपस्थित होना पड़े, तो यह स्वयं बहुत बड़ा दंड है। राज्य के डेटा, spelling और algorithm की गलती का बोझ नागरिक पर क्यों? मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और स्थायी रूप से स्थानांतरित नाम अवश्य हटने चाहिए। लेकिन उसके लिए घर-घर निष्पक्ष सत्यापन, व्यक्तिगत और स्पष्ट नोटिस, पर्याप्त समय, सार्वजनिक मापदंड और नाम हटाने से पहले प्रभावी सुनवाई जरूरी है। पहले नागरिक को संदिग्ध बनाना और फिर उससे अपनी पात्रता सिद्ध करवाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती।

एक अपात्र नाम सूची में रह जाना प्रशासनिक त्रुटि है, लेकिन एक पात्र नागरिक का वोट छीन लेना लोकतांत्रिक अन्याय है।
लोकतंत्र में नागरिक को सरकार या चुनाव आयोग नहीं चुनते—नागरिक सरकार चुनता है। इसलिए मतदाता को संदिग्ध बनाने वाली हर प्रक्रिया को सबसे कठोर सार्वजनिक और न्यायिक जाँच से गुजरना होगा। और चुनाव आयोग को बताना होगा कि सुप्रीम कोर्ट को पारदर्शिता, आधार, कारणों के प्रकाशन और प्रभावी अपील जैसी सामान्य लोकतांत्रिक सुरक्षा के लिए बार-बार हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सन्मार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।