नयी दिल्ली: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार को पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी दिए जाने के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि ‘‘पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला सिलसिला’’ जारी है।

कांग्रेस महासचिव रमेश ने मीडिया में आयी एक रिपोर्ट का ‘स्क्रीनशॉट’ सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा किया, जिसमें दावा किया गया है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपने केंद्रीय और राज्य स्तरीय विशेषज्ञ निकायों को परियोजना शुरू होने के बाद पर्यावरण मंजूरी देने के प्रस्तावों पर फिर से प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसे लंबित, खारिज या लौटाए गए प्रस्तावों को कानून के अनुसार उनके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने की अनुमति दिए जाने के दो महीने बाद आया है।
रमेश ने ‘एक्स’ पर कहा, ‘‘पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी दिए जाने का पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला सिलसिला जारी है।’’
पूर्व पर्यावरण मंत्री ने कहा कि 16 मई 2025 को उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने ऐसी मंजूरियों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था। उन्होंने इसे साहसी फैसला बताते हुए कहा कि यह 100 फीसदी सही था।
हालांकि, रमेश के अनुसार, 18 नवंबर 2025 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से पहले के फैसले को पलट दिया। उन्होंने कहा कि बहुत नरम शब्दों में कहें तो यह फैसला गलत था।
कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके बाद 29 जुलाई 2026 को वर्तमान प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की एक अन्य तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से मोदी सरकार द्वारा 14 मार्च 2017 को शुरू की गई और बाद में सात जुलाई 2021 के कार्यालय ज्ञापन के जरिए दोहराई गई पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी देने की व्यवस्था को रद्द कर दिया।
रमेश ने कहा कि यह बेहद स्वागत योग्य कदम था, लेकिन फैसले में उन मामलों को आगे बढ़ाने की अनुमति भी दी गई, जिनमें ऐसी मंजूरियां पहले ही दी जा चुकी थीं।
उन्होंने कहा कि इस छूट से फैसले का प्रभाव कुछ कम हो गया। उनके अनुसार, फैसले में मूल रूप से अतीत में किए गए ऐसे उल्लंघनों को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन भविष्य में कानून के इस तरह के उल्लंघनों का रास्ता बंद कर दिया गया।
रमेश ने कहा कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अब 29 जुलाई 2026 के इस फैसले को लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
रमेश ने कहा, ‘‘यह बात बार-बार बताने की जरूरत है कि कानून की अनभिज्ञता कभी पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी मांगने का कारण नहीं रही है।
हमेशा यह तरीका अपनाया गया कि पहले परियोजना शुरू कर दी जाए और बाद में पर्यावरण मंजूरी मांगी जाए। यानी ‘बाद में देखा जाएगा’ वाला रवैया अपनाया जाए।’’
उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में कानून की अनभिज्ञता, चाहे वह वास्तविक हो या किसी अन्य कारण से, किसी को दोषमुक्त करने का आधार नहीं होनी चाहिए।


