शंभु नाथ चौधरी

साल था 1987। मैं उम्र की उस दहलीज पर था, जहां किशोरावस्था पीछे छूट रही थी और यौवन धीरे-धीरे सामने आ रहा था। उन दिनों फिल्म देखना सिर्फ फिल्म देखना नहीं होता था। परदा गिरने के बाद भी फिल्म भीतर चलती रहती थी। किरदार साथ चलते थे, संवाद कानों में गूंजते रहते थे और कई-कई दिनों तक कोई चेहरा जेहन से उतरता नहीं था। उन्हीं दिनों धनबाद के पूजा टॉकीज में एक फिल्म देखी थी-‘प्रतिघात’।
उस फिल्म में पुलिस का एक एक्स कांस्टेबल था, जो सड़कों पर दौड़ता था। चेहरा विक्षिप्त-सा, कपड़े बेतरतीब, मगर आंखों में ऐसी चमक जैसे वह इस दुनिया की सारी चालाकियां देख रहा हो। वह व्यवस्था पर तंज करता था, चीखता था, हंसता था और ऐसी बातें कह जाता था, जिन्हें कहने की हिम्मत होश में रहने वाले बहुत से लोगों में भी नहीं होती। वह मेरा पहला ‘नाना’ था। फिल्म देखकर निकला तो कहानी पीछे छूट गई थी, मगर वह विक्षिप्त आदमी मेरे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गया था।
मैं सोचता रहा- कोई पागल होकर भी इतना सच कैसे बोल सकता है? बाद में समझ आया कि वह आदमी शायद पागल नहीं था। वह तो हमारी सामूहिक समझदारी पर सवाल खड़ा करने वाला सबसे होशियार आदमी था। उस दिन से नाना पाटेकर का मुरीद हो गया। फिर नाना जिस फिल्म में होते, कहानी चाहे जहां जाती, मेरी निगाहें उनका पीछा करती रहतीं। किरदार कोई भी हो सकता था- पुलिस वाला, फौजी, अपराध की दुनिया का आदमी, व्यवस्था से लड़ता हुआ आम इंसान या फिर ऐसा शख्स जो दो मिनट में पूरी महफिल का रंग बदल दे।
‘परिंदा’ का अन्ना आया तो लगा, यह आदमी डराता नहीं, डर को शक्ल देता है। ‘प्रहार’ का मेजर चौहान आया तो लगा, नाना ने सिर्फ फौजी की वर्दी नहीं पहनी है, उन्होंने उसके भीतर की सख्ती, अनुशासन और बेचैनी को भी अपने भीतर उतार लिया है। ‘तिरंगा’ के शिवाजीराव वागले में उनकी आवाज जैसे किसी अकेले आदमी की आवाज नहीं रह गई थी। उसमें पूरा हिंदुस्तान बोलता था। और फिर आया ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप नारायण तिलक। वह संवाद बोलता नहीं था, संवाद को जीता था। उसकी आवाज में गुस्सा था, मगर वह गुस्सा खोखला नहीं था। उसके पीछे भूख थी, बेइंसाफी थी, अपमान था और उस आदमी की बेचैनी थी जो अपने आसपास की दुनिया को चुपचाप स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
नाना का हर किरदार मुझे अपनी ओर खींचता रहा। मैं उनके बारे में पढ़ता, उनके इंटरव्यू खोज-खोजकर देखता, उनकी सादगी, संघर्ष, बेबाकी और उस खास किस्म के गुस्से के किस्से पढ़ता रहता। और हर बार मन में एक अजीब-सी तसल्ली उतरती। पर्दे पर जिस आदमी को मैं देखता हूं, असल जिंदगी में भी उसकी तस्वीर वैसी ही दिखाई देती। यह जानकर भीतर कहीं बहुत सुकून मिलता था। फिल्मों में अभिनेता अक्सर किरदार बदलते हैं। कैमरा बंद होते ही किरदार भी पीछे छूट जाता है। लेकिन नाना के मामले में पर्दे और जिंदगी के बीच यह फासला मुझे हमेशा कुछ कम ही लगा। उनके बारे में छपी खबरों, पढ़े हुए लेखों और देखे गए इंटरव्यू से जितना उन्हें समझ पाया, उतना ही लगा कि पर्दे पर दिखने वाला आदमी और पर्दे के बाहर का नाना एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं हैं। उन्होंने पर्दे पर किरदार जरूर बदले, लेकिन अपने भीतर के आदमी को कभी नहीं बदला।
फिर एक दिन ‘वेलकम’ आई और मेरे बच्चों की नाना से पहली मुलाकात हुई। उससे पहले जब वे पूछते-आपका पसंदीदा अभिनेता कौन है? मेरा जवाब होता- नाना पाटेकर। इसपर बच्चे मुझे ऐसे घूरते, जैसे मैं किसी गुजरे जमाने के अभिनेता का नाम ले रहा हूं। ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी ने बच्चों की धारणा ही बदल डाली। जिस नाना को वे हमारा जमाने का अभिनेता समझते थे, उसी के संवाद घर में दोहराए जाने लगे। घर में टीवी पर सबसे ज्यादा बार देखी गई फिल्मों की हमारी अपनी सूची में ‘वेलकम’ आज भी सबसे आगे है।
नाना का एक बिल्कुल नया रूप सामने था। वही आवाज, वही आंखें, वही अदाकारी; मगर इस बार गुस्से में हास्य घुला हुआ था। एक पल में गरजना और अगले ही पल ऐसा ठहाका कि सामने बैठा हर शख्स हंस पड़े। तब लगा, बड़ा अभिनेता वही है जो अपनी बनी-बनाई छवि का कैदी न हो।
करीब दो साल पहले ‘द लल्लनटॉप’ पर नाना का लगभग पौने चार घंटे का लंबा इंटरव्यू एक ही बैठक में देखा था। इंटरव्यू खत्म हुआ, लेकिन नाना के बारे में जानने की तलब खत्म नहीं हुई।
किसानों के लिए उनका काम, पानी के संकट से जूझते लोगों के बीच उनकी मौजूदगी, गांव और खेत से उनका रिश्ता। इन सबने पर्दे के नाना के पीछे खड़े असली आदमी को मेरी नजरों और बड़ा कर दिया। जिस आदमी ने फिल्मों में व्यवस्था से सवाल किए थे, वह जिंदगी में भी किनारे बैठकर तमाशा देखने वालों में नहीं था। वह जहां खड़ा होता था, वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराता था। और शायद नाना की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वह अभिनय करता था, लेकिन जिंदगी को अभिनय नहीं बनाता था।
जब खबर आई कि नाना नहीं रहे तो मन ने कई बार कहा, नहीं… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन जिंदगी फिल्मों की तरह नहीं होती। यहां रिटेक नहीं होता। नाना चले गए। लेकिन कुछ लोग जाते कहां हैं? वे अपनी आवाज में रह जाते हैं। अपने संवादों में रह जाते हैं। अपनी आंखों की बेचैन चमक में रह जाते हैं। उन किरदारों में रह जाते हैं, जिन्हें उन्होंने निभाया नहीं, जिया था। मेरे लिए नाना सबसे पहले हमेशा वही रहेंगे। 1987 के धनबाद के पूजा टॉकीज के पर्दे पर मुझसे मिला वह विक्षिप्त आदमी, सड़क पर दौड़ते हुए पूरी व्यवस्था पर तंज कर रहा था। फिर वह अन्ना होगा। मेजर चौहान होगा। शिवाजीराव वागले होगा। प्रताप नारायण तिलक होगा। और फिर अचानक उदय शेट्टी बनकर हमारे घर के टेलीविजन पर ठहाका लगाता दिखाई देगा। कभी गुस्से में उबलता हुआ। कभी ठठाकर हंसता हुआ। कभी किसी बेबस आदमी के साथ खड़ा हुआ। कभी किसानों के बीच मिट्टी में खड़ा हुआ। कभी जवानों के साथ मोर्चे पर। और शायद यही नाना की असली पहचान थी। वह पर्दे पर किरदार बदलता था, जिंदगी में नहीं।


