2009 से 2015 के बीच दर्ज हुए थे मामले
जनहित याचिका में राज्य के विभिन्न जिलों में पुल ढहने की घटनाओं, निर्माण में कथित अनियमितताओं और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी का मुद्दा उठाया गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि धनबाद, पलामू और गुमला में पुलों के ढहने से संबंधित कई मामले वर्ष 2009 से 2015 के बीच दर्ज किए गए थे, लेकिन उनकी जांच लंबे समय से लंबित है। हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक जांच को एक दशक से अधिक समय तक लंबित रखना उचित नहीं है। इससे न्याय मिलने में देरी होती है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
तीन महीने में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने तीनों जिलों के एसपी को निर्देश दिया कि वे संबंधित मामलों की जांच में तेजी लाएं। आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद अधिमानतः तीन महीने के भीतर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत अंतिम रिपोर्ट संबंधित अदालत में दाखिल कराने की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबित मामलों को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि संबंधित मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी हो सके।
अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी समय पर पूरी होगी
अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को भी पुल ढहने के मामलों में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लंबित विभागीय कार्यवाही की निगरानी करने का निर्देश दिया है। विभागीय प्रक्रिया को कानून के अनुसार अधिमानतः तीन महीने के भीतर पूरा करने को कहा गया है।
निर्धारित समयसीमा के बाद संबंधित एसपी और ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा। यदि जांच या विभागीय कार्यवाही तय समय में पूरी नहीं होती है, तो हलफनामे में देरी के कारण भी स्पष्ट करने होंगे। अदालत ने इस संबंध में अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की है।
ईडी जांच और नई व्यापक जांच की मांग स्वीकार नहीं
याचिकाकर्ता ने पुलों के ढहने की घटनाओं की व्यापक जांच कराने, वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से जांच कराने की मांग की थी। याचिका में ग्रामीण विकास विभाग के तत्कालीन मुख्य अभियंता एवं प्रभारी अभियंता प्रमुख बीरेंद्र राम से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का भी उल्लेख किया गया था।
अदालत ने कहा कि बीरेंद्र राम और अन्य आरोपियों के खिलाफ ईडी की कार्रवाई में अभियोजन शिकायत दाखिल हो चुकी है और विशेष अदालत ने उसका संज्ञान भी लिया है। ऐसे में इस संबंध में अलग से निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने बीरेंद्र राम को पद से हटाने की मांग भी स्वीकार नहीं की।
सरकार ने अदालत में रखी कार्रवाई की जानकारी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज की गई थी, ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई हुई और अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। कुछ पुलों के मामलों में बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा से तकनीकी जांच भी कराई गई थी।
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर नई व्यापक जांच या केंद्रीय एजेंसी को जांच सौंपने का आदेश नहीं दिया। हालांकि, पुराने मामलों की जांच और विभागीय कार्रवाई में हो रही देरी को देखते हुए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब धनबाद, पलामू और गुमला में पुल ढहने से जुड़े लंबित मामलों की जांच तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही को निर्धारित समयसीमा में आगे बढ़ाना होगा।


