102वीं जयंती पर विशेष : एक व्यक्ति नहीं, एक युगदृष्टा थे बाबा कार्तिक उरांव

बाबा कार्तिक उरांव की 102वीं जयंती पर जानिए गुमला के एक साधारण आदिवासी परिवार से विश्वस्तरीय इंजीनियर और जननेता बनने तक का उनका प्रेरणादायक सफर, संघर्ष और समाजसेवा की कहानी।

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डॉ अरुण उरांव

इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन उनके जन्म और मृत्यु की तिथियों के बीच सीमित नहीं रहता। वे अपने विचारों, संघर्षों और समाज के प्रति समर्पण के कारण आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। बाबा कार्तिक उरांव ऐसे ही एक असाधारण व्यक्तित्व थे।
वे केवल एक राजनेता नहीं थे। वे एक दूरदर्शी अभियंता, उच्चकोटि के शिक्षाविद्, प्रखर चिंतक, आदिवासी अस्मिता के सजग प्रहरी और सबसे बढ़कर समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को समझने वाले संवेदनशील इंसान थे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि गरीबी और अभाव किसी व्यक्ति की प्रतिभा को रोक नहीं सकते, यदि उसके भीतर दृढ़ संकल्प, अनुशासन और आगे बढ़ने की अदम्य इच्छाशक्ति हो। 29 अक्टूबर 2026 को उनकी 102वीं जयंती के अवसर पर हमें केवल उनके व्यक्तित्व का स्मरण नहीं करना चाहिए, बल्कि गंभीरता से आत्मचिंतन भी करना चाहिए कि जिस समाज के उत्थान के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया, आज वह समाज कहाँ खड़ा है और उनके सपनों को साकार करने के लिए हम क्या कर रहे हैं।

एक साधारण आदिवासी परिवार से असाधारण ऊंचाइयों तक

बाबा कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को तत्कालीन बिहार, वर्तमान झारखंड के गुमला जिले के करौंदा लिटाटोली गाँव में एक साधारण उरांव आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जैरा उरांव और माता का नाम बिरसी उरांव था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ सीमित संसाधन, आर्थिक कठिनाइयाँ और शिक्षा के अपर्याप्त अवसर जीवन की वास्तविकताएँ थीं। लेकिन बालक कार्तिक की आँखों में कुछ अलग करने का सपना था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुमला में हुई। इसके बाद उन्होंने पटना साइंस कॉलेज में अध्ययन किया और बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पटना से अभियंत्रण की शिक्षा प्राप्त की। उस समय किसी सुदूर आदिवासी गाँव के युवक का उच्च शिक्षा के लिए पटना पहुँचना ही एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन कार्तिक उरांव की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्होंने उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए इंग्लैंड का रुख किया। वहाँ उन्होंने इंजीनियरिंग के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च अध्ययन किया और अनेक तकनीकी योग्यताएँ अर्जित कीं। उनकी नौ उच्च शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यताओं का उल्लेख आज भी बड़े गर्व के साथ किया जाता है। उन्होंने ब्रिटेन में प्रतिष्ठित तकनीकी परियोजनाओं पर कार्य किया। परमाणु ऊर्जा संयंत्र से संबंधित इंजीनियरिंग कार्यों में उनकी भागीदारी उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचायक थी।

कल्पना कीजिए—गुमला के एक छोटे से गाँव का वह बालक, जिसने कभी संसाधनों के अभाव में अपनी शिक्षा प्रारंभ की थी, एक दिन विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग परियोजनाओं का हिस्सा बन गया। यह केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं थी। यह संपूर्ण आदिवासी समाज की बौद्धिक क्षमता का विश्व के सामने प्रमाण था।

विदेश की उपलब्धियाँ, लेकिन मन अपनी मिट्टी में

बाबा चाहते तो विदेश में एक प्रतिष्ठित अभियंता के रूप में सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उनकी आत्मा अपनी जन्मभूमि, अपने लोगों और अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई थी। वे भारत लौट आए और रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन में उच्च तकनीकी पद पर कार्य करने लगे। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। एक ओर सुरक्षित और सम्मानजनक पेशेवर भविष्य था, तो दूसरी ओर अपने समाज की गरीबी, अशिक्षा, शोषण और उपेक्षा की चुनौती। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। यह निर्णय केवल पेशा बदलने का नहीं था। यह व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर उठकर सामूहिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने का निर्णय था।

राजनीति उनके लिए सत्ता नहीं, समाज सेवा का माध्यम थी

बाबा कार्तिक उरांव ने राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन नहीं बनाया। उनके लिए राजनीति समाज की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने का माध्यम थी। वे 1967, 1971 और 1980 में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने बिहार विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व किया तथा भारत सरकार में नागरिक उड्डयन एवं संचार से संबंधित मंत्री पद का दायित्व संभाला। लेकिन इन पदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था उनका सामाजिक दृष्टिकोण। वे जानते थे कि आदिवासी समाज की समस्याएँ केवल आर्थिक नहीं हैं। इनका संबंध शिक्षा, भूमि, संस्कृति, पहचान, संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी है। उन्होंने संसद में आदिवासी समाज के अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े विषयों को दृढ़ता से उठाया। आदिवासी पहचान तथा आरक्षण के संबंध में उनके कुछ विचार उस समय भी व्यापक बहस का विषय थे और आज भी उन पर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं। लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन की एक केंद्रीय चिंता निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण थी—आदिवासी समाज अपनी पहचान, अधिकार और सम्मान के साथ विकास की मुख्यधारा में आगे बढ़े। उन्होंने अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के माध्यम से समाज को संगठित करने और उसके प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि समाज को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि शिक्षित, जागरूक और संगठित नेतृत्व की आवश्यकता है।

अपनी संस्कृति पर गर्व

बाबा कार्तिक उरांव आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समर्थक थे, लेकिन वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कभी दूर नहीं हुए। उनके जीवन से एक महत्वपूर्ण संदेश मिलता है— आधुनिक बनना अपनी परंपराओं को भूलना नहीं है। अपनी मातृभाषा, सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक व्यवस्था, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए भी हम विज्ञान, तकनीक और आधुनिक ज्ञान के क्षेत्र में विश्व की अग्रिम पंक्ति में खड़े हो सकते हैं। आज जब अनेक आदिवासी भाषाएँ और परंपराएँ धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं, बाबा का यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 8 दिसंबर 1981 को उनका असामयिक निधन हो गया। मात्र 57 वर्ष की आयु में देश ने एक विलक्षण प्रतिभा और आदिवासी समाज ने अपना एक दूरदर्शी नेतृत्व खो दिया। लेकिन उनके विचारों की यात्रा आज भी जारी है।

आज के संदर्भ में बाबा कार्तिक उरांव हमें क्या सिखाते हैं?

बाबा की जयंती मनाने का वास्तविक अर्थ उनके चित्र पर पुष्प अर्पित करना भर नहीं है। उनके विचारों को अपने आचरण और सामाजिक प्रयासों में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आज झारखंड और देश का आदिवासी समाज अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। शिक्षा का विस्तार हुआ है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच में अब भी असमानताएँ हैं। सरकारी योजनाएँ हैं, लेकिन उनका लाभ हर जरूरतमंद तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता। आधुनिक विकास के अवसर बढ़े हैं, लेकिन अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और सामाजिक असुरक्षा आज भी गंभीर समस्याएँ हैं। ऐसे समय में बाबा के जीवन से हमें पाँच महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।

पहली सीख : शिक्षा ही वास्तविक सशक्तीकरण का आधार है।

बाबा स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण थे। उन्होंने दिखाया कि एक साधारण ग्रामीण परिवार का बच्चा भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ हासिल कर सकता है। आज हमारे समाज को केवल साक्षरता नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है। हमें ऐसे बच्चे तैयार करने होंगे जो डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, उद्यमी और संवेदनशील जनप्रतिनिधि बन सकें। साथ ही, उन्हें अपने समाज और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा भी देनी होगी।

दूसरी सीख : व्यक्तिगत सफलता का वास्तविक मूल्य सामाजिक योगदान ।

बाबा ने अपनी प्रतिभा और उच्च शिक्षा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के लिए नहीं किया। उन्होंने समाज की सेवा को प्राथमिकता दी।
आज हमारे समाज से बड़ी संख्या में शिक्षित युवक-युवतियाँ विभिन्न क्षेत्रों में सफल हो रहे हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है— क्या हमारी व्यक्तिगत सफलता का कुछ हिस्सा हमारे गाँव, हमारे समाज और हमारे जरूरतमंद बच्चों तक पहुँच रहा है? यदि प्रत्येक सफल व्यक्ति अपने गाँव के कुछ बच्चों की शिक्षा का दायित्व स्वीकार कर ले, तो सामाजिक परिवर्तन की एक नई शुरुआत हो सकती है।

तीसरी सीख : अपनी पहचान के साथ आधुनिकता को अपनाना 

आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट भाषाएँ, परंपराएँ, सामुदायिक संस्थाएँ और जीवन-दर्शन हैं। इनका संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन सांस्कृतिक संरक्षण का अर्थ आधुनिक शिक्षा, विज्ञान या तकनीक से दूरी बनाना नहीं है। हमें अपने बच्चों को कंप्यूटर, विज्ञान, अंग्रेजी और आधुनिक तकनीक सिखानी चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें कुड़ुख सहित अपनी मातृभाषाओं, लोककथाओं, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं से भी परिचित कराना चाहिए। हमारी जड़ें हमारी पहचान हैं और शिक्षा हमारे भविष्य के पंख।

चौथी सीख : समाज को संगठित किए बिना स्थायी परिवर्तन संभव नहीं

बाबा ने समाज को जागरूक और संगठित करने पर विशेष बल दिया। आज आवश्यकता है कि गाँवों की पारंपरिक सामुदायिक संस्थाएँ, शिक्षित युवा, महिलाएँ, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि मिलकर विकास की साझा कार्ययोजना तैयार करें। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और आजीविका जैसे विषयों पर सामूहिक प्रयास होने चाहिए।

पाँचवीं सीख : नेतृत्व का अर्थ पद नहीं, जिम्मेदारी है

बाबा का जीवन हमें सिखाता है कि किसी व्यक्ति की महानता उसके पद से नहीं, बल्कि समाज के प्रति उसके योगदान से निर्धारित होती है। आज हमें ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो समाज को बाँटने के बजाय जोड़े, समस्याओं को समझे, युवाओं को प्रेरित करे और भविष्य के लिए संस्थाएँ खड़ी करे।

कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला : बाबा के सपनों की दिशा में हमारा छोटा प्रयास

बाबा कार्तिक उरांव का जीवन और उनके विचार मेरे लिए केवल इतिहास का विषय नहीं हैं। उनसे मेरा गहरा पारिवारिक और भावनात्मक संबंध भी है। मुझे उनके परिवार का सदस्य होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। लेकिन मैं मानता हूँ कि किसी महान व्यक्तित्व से पारिवारिक संबंध होना अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तब है, जब हम उनके विचारों को आगे बढ़ाने के लिए अपने जीवन में कुछ सार्थक कर सकें।

इसी भावना ने मुझे ग्रामीण आदिवासी बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करने के लिए प्रेरित किया। अपने प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के दौरान झारखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करते हुए मैंने ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को बहुत करीब से देखा।विशेषकर लातेहार, पूर्वी सिंहभूम और संताल परगना के क्षेत्रों में मुझे यह अनुभव हुआ कि अनेक प्रतिभाशाली बच्चों का भविष्य केवल इसलिए सीमित रह जाता है, क्योंकि उन्हें समय पर उचित शैक्षणिक मार्गदर्शन और सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। इन बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं थी। कमी थी अवसरों की। अनेक गाँवों में बच्चे सरकारी विद्यालयों में तो जाते थे, लेकिन घर लौटने के बाद उन्हें पढ़ाई में सहायता करने वाला कोई नहीं होता था। अभिभावक आर्थिक कठिनाइयों और सीमित शैक्षणिक पृष्ठभूमि के कारण चाहकर भी बच्चों का मार्गदर्शन नहीं कर पाते थे। कहीं बिजली की समस्या थी, कहीं अध्ययन सामग्री का अभाव और कहीं पढ़ाई के लिए अनुकूल वातावरण का। इन्हीं अनुभवों ने मेरे मन में एक विचार को जन्म दिया— क्यों न गाँव के ही शिक्षित युवाओं को जोड़कर बच्चों के लिए एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जहाँ उन्हें निःशुल्क शिक्षा और मार्गदर्शन मिल सके? इसी सोच से कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला की परिकल्पना साकार होने लगी।

गाँव के युवा ही बने परिवर्तन के वाहक

रात्रि पाठशाला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका आधार स्थानीय समाज है। हमने गाँवों के कॉलेज में पढ़ने वाले युवक-युवतियों को बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। ये युवा बिना किसी वेतन के स्वेच्छा से शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। दिन में अपनी पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियाँ पूरी करने के बाद वे गाँव के छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालते हैं। यह केवल शिक्षण व्यवस्था नहीं है। यह सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का भी प्रयास है। हमारा विश्वास है कि जब गाँव का एक शिक्षित युवक अपने ही गाँव के बच्चों को पढ़ाता है, तो वह केवल ज्ञान नहीं बाँटता, बल्कि समाज में विश्वास, सहयोग और नेतृत्व की नई परंपरा स्थापित करता है।

141 गाँवों में शिक्षा की छोटी-छोटी ज्योतियाँ

आज कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला का प्रयास दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के 141 गाँवों तक पहुँच चुका है। इन पाठशालाओं से लगभग 5,000 बच्चे जुड़े हुए हैं, जिनमें अधिकांश आदिवासी एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। यह संख्या हमारे लिए केवल आँकड़ा नहीं है। इन पाँच हजार बच्चों के पीछे पाँच हजार परिवारों की आशाएँ हैं। किसी माँ का सपना है कि उसकी बेटी शिक्षिका बने। किसी किसान की इच्छा है कि उसका बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने। किसी मजदूर की उम्मीद है कि उसका बच्चा वह मुकाम हासिल करे, जहाँ तक वह स्वयं नहीं पहुँच सका। और जब किसी गाँव में शाम ढलने के बाद बच्चे अपनी किताबें लेकर एक स्थान पर एकत्र होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो अँधेरे के बीच भविष्य की छोटी-छोटी ज्योतियाँ जल उठी हों। हमारा प्रयास है कि आर्थिक अभाव किसी बच्चे के सपनों की सीमा न बन जाए।

केवल पाठशाला नहीं, सामाजिक चेतना का अभियान

हमारा उद्देश्य बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देना नहीं है। हम चाहते हैं कि उनमें अनुशासन, आत्मविश्वास, स्वच्छता, सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति सम्मान विकसित हो। रात्रि पाठशाला के स्वयंसेवी शिक्षकों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं। इनमें सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक, चिकित्सक और विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी लोग भी मार्गदर्शन देते हैं। हर दो-तीन महीने में शिक्षकों के साथ बैठकर हम उनकी कठिनाइयों, बच्चों की प्रगति और शिक्षण की गुणवत्ता पर चर्चा करने का प्रयास करते हैं। मेरा मानना है कि यदि हम एक अच्छे शिक्षक को तैयार करते हैं, तो उसके माध्यम से अनेक बच्चों का भविष्य बदल सकता है।

कार्तिक उरांव अकादमी ऑफ एक्सीलेंस : एक और कदम

रात्रि पाठशाला के इस प्रयास को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत स्वरूप देने के उद्देश्य से रांची जिले के उचरी, मांडर में कार्तिक उरांव अकादमी ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की गई। 6 अप्रैल 2026 को इस अकादमी का उद्घाटन किया गया। तीन कमरों से प्रारंभ हुई यह अकादमी भले ही आकार में छोटी हो, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सपना है। हम चाहते हैं कि यह संस्था रात्रि पाठशालाओं के लिए प्रशिक्षण, शैक्षणिक नवाचार, व्यक्तित्व विकास और सामुदायिक सहभागिता का केंद्र बने। भविष्य में बच्चों को बेहतर शैक्षणिक सामग्री, डिजिटल शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रारंभिक मार्गदर्शन तथा अपनी भाषा और संस्कृति के अध्ययन के अवसर उपलब्ध कराना हमारी आकांक्षा है। यह यात्रा अभी प्रारंभिक अवस्था में है। संसाधन सीमित हैं और चुनौतियाँ अनेक हैं। लेकिन हमें विश्वास है कि समाज के सहयोग, स्वयंसेवी शिक्षकों के समर्पण और बच्चों की लगन से यह छोटा प्रयास भविष्य में व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

बाबा की विरासत : स्मारकों से आगे, समाज के जीवन में

आज बाबा कार्तिक उरांव की जयंती पर एक प्रश्न हम सभी को स्वयं से पूछना चाहिए। क्या किसी महान व्यक्ति की विरासत केवल उनकी प्रतिमा स्थापित करने, समारोह आयोजित करने और उनके नाम पर संस्थाओं का नामकरण करने से सुरक्षित हो जाती है? निश्चित रूप से नहीं। उनकी वास्तविक विरासत तब जीवित रहती है, जब उनके विचार समाज के जीवन में दिखाई देने लगें। जब किसी गरीब आदिवासी परिवार की बेटी उच्च शिक्षा प्राप्त करती है, तब बाबा का सपना आगे बढ़ता है। जब कोई ग्रामीण युवक अपनी व्यक्तिगत सफलता के बाद अपने गाँव लौटकर बच्चों को पढ़ाता है, तब बाबा का सपना आगे बढ़ता है। जब कोई युवा अपनी मातृभाषा और संस्कृति पर गर्व करते हुए आधुनिक विज्ञान और तकनीक में दक्षता प्राप्त करता है, तब बाबा का सपना आगे बढ़ता है। और जब समाज का कोई सक्षम व्यक्ति बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा के जरूरतमंदों की सहायता करता है, तब बाबा के जीवन का संदेश सार्थक होता है। हमारी रात्रि पाठशाला इसी भावना की एक छोटी अभिव्यक्ति है। हम यह दावा नहीं करते कि हमने कोई बहुत बड़ा कार्य कर लिया है। 141 गाँवों और पाँच हजार बच्चों तक पहुँचना निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है, लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि हजारों गाँवों और लाखों बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने की चुनौती अभी शेष है। यह यात्रा लंबी है और हमारा प्रयास अभी बहुत छोटा है। फिर भी हमें संतोष है कि हमने केवल समस्याओं की चर्चा करने के बजाय अपने सीमित संसाधनों से उनके समाधान की दिशा में कुछ कदम उठाने का प्रयास किया है।

नई पीढ़ी से मेरी अपील

आज बाबा कार्तिक उरांव की 102वीं जयंती पर मैं विशेष रूप से आदिवासी समाज के शिक्षित युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों, अधिकारियों, चिकित्सकों, अभियंताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपील करना चाहता हूँ। हम सभी अपने जीवन में चाहे जिस क्षेत्र में कार्यरत हों, अपने समाज के लिए कुछ समय अवश्य निकालें। जरूरी नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति कोई बड़ी संस्था स्थापित करे। यदि कोई युवा सप्ताह में कुछ घंटे बच्चों को पढ़ा सकता है, तो वह भी समाज सेवा है। यदि कोई शिक्षक किसी गरीब विद्यार्थी को निःशुल्क मार्गदर्शन दे सकता है, तो वह भी समाज सेवा है। यदि कोई सक्षम परिवार एक जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में सहयोग कर सकता है, तो वह भी बाबा के सपनों को आगे बढ़ाने का माध्यम है। यदि कोई शिक्षित व्यक्ति अपने गाँव में पुस्तकालय, अध्ययन केंद्र या डिजिटल शिक्षा की व्यवस्था करने में सहयोग कर सकता है, तो वह एक स्थायी सामाजिक योगदान होगा। हमें यह समझना होगा कि समाज का भविष्य केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के शिक्षित और सक्षम लोगों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है। बाबा ने हमें सिखाया कि शिक्षा प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उस शिक्षा का उपयोग समाज के उत्थान के लिए करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

एक व्यक्तिगत संकल्प

बाबा कार्तिक उरांव के जीवन पर विचार करते समय मेरे मन में हमेशा एक भावनात्मक प्रश्न उठता है। जिस व्यक्ति ने अपनी असाधारण प्रतिभा, उच्च शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य को समाज के हित में समर्पित कर दिया, उसकी विरासत के प्रति हमारी जिम्मेदारी क्या है? मेरे लिए इसका उत्तर स्पष्ट है। उनके विचारों को जीवित रखना है। उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाना है। और विशेष रूप से उन बच्चों तक शिक्षा का प्रकाश पहुँचाना है, जिनके जीवन में अवसरों का अभाव है। जब मैं किसी रात्रि पाठशाला में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ते देखता हूँ, जब किसी युवा स्वयंसेवी शिक्षक को पूरे समर्पण से बच्चों को समझाते देखता हूँ, तब मन में एक अलग प्रकार का संतोष होता है। उन बच्चों में मुझे भविष्य के डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रशासक और समाजसेवी दिखाई देते हैं। कौन जानता है, इन्हीं बच्चों में से कोई भविष्य में बाबा कार्तिक उरांव की तरह असाधारण उपलब्धियाँ हासिल करे! शायद किसी छोटे से गाँव में बैठा कोई बच्चा एक दिन विश्व के किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय तक पहुँचे। शायद कोई बच्ची भविष्य में अपने समाज के हजारों लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने वाली बने। यदि ऐसा होता है, तो हमारे प्रयासों को वास्तविक सफलता मिलेगी। हमारा सपना केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उनमें अपने समाज को आगे बढ़ाने की भावना पैदा करना है।

बाबा को सच्ची श्रद्धांजलि

29 अक्टूबर का दिन हमारे लिए केवल एक महान व्यक्तित्व की जयंती नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नए संकल्प का अवसर होना चाहिए। बाबा कार्तिक उरांव ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि साधारण परिस्थितियों में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि व्यक्तिगत सफलता का सर्वोच्च रूप समाज के प्रति समर्पण है। आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ। उनके जीवन पर शोध हो। उनके शैक्षणिक, तकनीकी और राजनीतिक योगदान का गंभीर अध्ययन हो। उनके विचारों पर संवाद हो। और सबसे महत्वपूर्ण, उनके सामाजिक उत्थान के सपनों को धरातल पर उतारने के लिए ठोस प्रयास हों। कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला इसी दिशा में हमारा एक विनम्र प्रयास है। हमारा विश्वास है कि यदि समाज के सक्षम लोग आगे आएँ और गाँवों के युवा इस अभियान से जुड़ें, तो शिक्षा के माध्यम से परिवर्तन की एक बड़ी धारा विकसित की जा सकती है।

अंत में, बाबा की पावन स्मृति को नमन करते हुए मैं यही कहना चाहूँगा— बाबा कार्तिक उरांव ने स्वयं शिक्षा की ऊँचाइयों को छुआ, लेकिन अपने समाज को कभी नहीं भूले। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ाना है। हमारी रात्रि पाठशालाओं में पढ़ने वाले हजारों बच्चों की आँखों में जो सपने पल रहे हैं, उन्हीं सपनों में हम बाबा के विचारों का भविष्य देखते हैं। हमारा प्रयास छोटा हो सकता है, लेकिन हमारा संकल्प बड़ा है। हम चाहते हैं कि आने वाले वर्षों में झारखंड का कोई भी प्रतिभाशाली बच्चा केवल गरीबी, अभाव या अवसरों की कमी के कारण शिक्षा से वंचित न रह जाए। यही बाबा के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बाबा कार्तिक उरांव अमर रहें-उनके विचार हमें सदैव प्रेरित करते रहें।

पूर्व आईपीएस संस्थापक एवं संरक्षक, कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।