
विष्णु नागर
तो अखिलेश यादव के लिए भी सेकुलरिज्म से ऊपर जातिवाद है। इंडियन एक्सप्रेस ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार द्वारा उनके इस पद पर बैठने के बाद से उज्जैन में की गई कीमती जमीनों की बहुत बड़ी खरीद पर सवाल उठाए हैं। भाजपा उनके बचाव में नहीं आई है मगर अखिलेश यादव आगे बढ़ कर सामने आए हैं। उन्होंने लीपापोती करते हुए कहा है कि मोहन यादव के खिलाफ भाजपा षड़यंत्र कर रही है। उन्हें बदनाम किया जा रहा है।जिन तीन मुख्यमंत्रियों को भाजपा हटाना चाहती है, उनमें एक मोहन यादव हैं, इसलिए ये सवाल उठाए जा रहे हैं।मोहन यादव पहले से ही जमीन की खरीद फरोख्त के धंधे में हैं। वगैरह- वगैरह।
भाजपा के किसी मुख्यमंत्री के बचाव में आने की अखिलेश यादव को जरूरत क्या थी, सिवाय इसके कि वह मोहन यादव हैं? स्पष्ट है कि जब सवाल यादव का हो तो अखिलेश यादव का सेकुलरिज्म हवा हो जाता है। तब वह भाजपा के मुख्यमंत्री के बचाव में आने से भी नहीं हिचकते। मान लो कि मोहन यादव को भाजपा हटाना चाहती है तो अखिलेश यादव को इससे तकलीफ़ क्यों होना चाहिए? भाजपा ने अखिलेश यादव से पूछकर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया था और मान लो वह उन्हें हटाना चाहती है तो वह अखिलेश यादव की इस सिफारिश को महत्व नहीं देगी!
और माननीय अखिलेश जी अगर आप यह सपना पाले हुए हैं कि इस तरह आप मोहन यादव को अपने पाले में खींच सकेंगे तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है।
भूतपूर्व होने पर भी मोहन यादव के लिए सबसे अधिक सुरक्षित भाजपा में रहना है।वे एक इंच भी आपकी तरफ बढ़े तो भाजपा उन्हें बख्शेगी नहीं, इतने चतुर तो वे हैं। शिवराज सिंह चौहान जैसा पुराने घुटे हुए खिलाड़ी को मोदी ने पद से हटाया था तो वे रोये थे मगर उन्होंने मुंह बंद रखा था।मोदी- शाह के बाड़े से निकलकर जाने में खतरा इतना बड़ा है कि मोहन यादव इसे सपने में भी उठा नहीं सकते! समझ में नहीं आता अखिलेश यादव, मोहन यादव का बचाव करके क्या हासिल करना चाहते हैं,सिवाय इसके कि अंततः वह यादववादी हैं। उन्होंने अपनी सेकुलर इमेज को इससे धक्का पहुंचाया है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

