
लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि जब कथित साइबर अपराध के लेनदेन में एक खास रकम शामिल हो तो जांच एजेंसियां एक व्यक्ति के संपूर्ण बैंक खाते को धन निकासी के लिए फ्रीज नहीं कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि यह रोक, अपराध से प्राप्त संदिग्ध आय के अनुपात में ही होनी चाहिए। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने बृहस्पतिवार को लखनऊ स्थित व्यवसायी रितेश यादव की याचिका निस्तारित करते हुए बैंकों को उसके खातों से रोक हटाने और 36,000 रुपये की विवादित राशि को खाते में बनाए रखते हुए इससे परे राशि का लेनदेन करने की अनुमति देने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि एक साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज करने के अधिकार को एक व्यक्ति के संपूर्ण वित्तीय जीवन और वैध व्यावसायिक गतिविधियां ठप करने की बेलगाम शक्ति के तौर पर नहीं देखा जा सकता। निर्माण से जुड़े कार्य और निर्माण सामग्री की आपूर्ति के व्यवसाय में लगे याचिकाकर्ता यादव ने बंधन बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एक्सिस बैंक सहित कई बैंकों अपने खाते फ्रीज किए जाने के बाद अदालत का रुख किया। उनका दावा है कि खाते फ्रीज करने की कार्रवाई कर्नाटक में एक साइबर अपराध की जांच के उपरांत की गई। एक विवादित लेनदेन में 36,000 रुपये कथित तौर पर उनके बंधन बैंक खाते में भेजे गए थे।
अदालत ने इस आदेश की प्रति बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बीच प्रसारित करने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक को भेजने का निर्देश दिया ताकि उनके अधिकारी और कर्मचारी तय शिकायत निवारण प्रक्रिया से अवगत हों। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि उसके निर्देशों का इरादा जांच एजेंसियों की कानूनी शक्तियों को कम करने का नहीं है, बल्कि इस तरह की शक्तियों का उपयोग एक पारदर्शी, समानुपातिक और कानूनी रूप से सही तरीके से किया जाए।

