रांची: झारखंड के राज्य में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां अब गंभीर रूप ले रही हैं। सदर अस्पताल चाईबासा की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सह ब्रेन डायनेमिक्स की निदेशक डॉ. भाग्यश्री कर ने क्षेत्र में बढ़ते वैवाहिक तनाव, पारिवारिक कलह और विशेष रूप से बच्चों तथा किशोरों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने अभिभावकों और समाज से इन मामलों में संवेदनशीलता और सतर्कता बरतने की जोरदार अपील की है।

वैवाहिक कलह और मानसिक संकट का बढ़ता खतरा


डॉ. कर ने एक केस स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि लंबे समय तक चलने वाला वैवाहिक तनाव, आर्थिक दबाव और पारिवारिक दखलंदाजी व्यक्ति को किस कदर मानसिक अवसाद में धकेल सकती है। कई मामलों में पति-पत्नी के बीच के झगड़े और अपमानजनक संवाद के कारण पीड़ित व्यक्ति गंभीर अनिद्रा, घबराहट और आत्मघाती ख्यालों का शिकार हो जाते हैं।
अक्सर परिवार इन शुरुआती लक्षणों को मामूली नोंकझोक समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में खतरनाक साबित होता है। डॉ. कर ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या की बात करने वाले संकेतों को कभी भी केवल ‘ध्यान खींचने का प्रयास’ मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
ऐसी स्थिति में पीड़ित को अकेला न छोड़ें, खतरनाक वस्तुओं को दूर रखें और तुरंत किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या नजदीकी अस्पताल से संपर्क करें। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी चेताया कि माता-पिता के बीच लगातार रहने वाला तनाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, उनकी पढ़ाई और व्यवहार पर बुरा असर डालता है, इसलिए बच्चों को इस कलह से दूर रखना बेहद जरूरी है।
मोबाइल, सोशल मीडिया और बच्चों में नशे की लत बढ़ते किशोर अपराध और नशे की प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए डॉ. कर ने बताया कि पीयर प्रेशर (साथियों का दबाव), गलत संगति, भावनात्मक उपेक्षा और मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों को जोखिम भरे रास्तों पर ले जा रहा है। एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे सोशल मीडिया के जरिए बच्चे ऑनलाइन ठगों या नशा करने वाले समूहों के संपर्क में आ जाते हैं, जो नशे को ‘कूल’ बताकर किशोरों को आकर्षित करते हैं।

अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना, पढ़ाई में गिरावट, रातभर मोबाइल चलाना, बार-बार पैसे की मांग करना और घर में बातें छुपाना इसके प्रमुख लक्षण हैं। डॉ. कर के अनुसार, ऐसी स्थिति में बच्चों को डांटने या उनसे जबरन फोन छीनने के बजाय उनके साथ संवाद स्थापित करना अधिक प्रभावी होता है।
डॉ. कर ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य और नशे जैसी समस्याओं को छुपाने से स्थिति और बिगड़ती है। स्कूलों और कॉलेजों में भी डिजिटल सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल पर नियमित कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। समाज और परिवार के संयुक्त प्रयासों से ही इन विकट परिस्थितियों से निपटा जा सकता है।
बचाव और समाधान के लिए दिया सुझाव
बच्चों के साथ स्क्रीन टाइम को कम करे और सोने का रूटीन तय करें।
फोन पूरी तरह छीनने के बजाय उसके उपयोग के स्पष्ट और पारदर्शी नियम बनाएं।
बच्चों के ऑनलाइन मित्रों और उनकी गतिविधियों पर बिना जासूसी के नजर रखें।
परिवार के भीतर संवाद, खेलकूद और आपसी मेलजोल को बढ़ावा दें।
किसी भी प्रकार के अचानक व्यवहार परिवर्तन को नजरअंदाज न करें और समय पर काउंसलिंग या डि-एडिक्शन सेवाओं की मदद लें।


