नई दिल्ली: गृह मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय ने ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ की पड़ताल कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को मंगलवार को विधेयक के प्रावधानों पर बिंदुवार जानकारी दी। इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों द्वारा विरोध जताया जा रहा है। विधेयक के प्रावधानों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करने के लिए भाजपा सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता में 31 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।

सूत्रों ने बताया कि दोनों मंत्रालयों के अधिकारियों ने 2010 के मूल कानून में संशोधन लाने के कारणों पर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिए। विदेशी धन प्राप्त करने वाले सभी संगठनों और एनजीओ के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है और गृह मंत्रालय नोडल प्राधिकरण के रूप में इनकी निगरानी करता है। सूत्रों के अनुसार बैठक में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अध्यक्ष चल्ला श्रीनिवासुलु शेट्टी, सरकार के शीर्ष विधि अधिकारियों और वरिष्ठ वकीलों समेत विषय विशेषज्ञों के भी जेपीसी के समक्ष अपने विचार रखने की संभावना है।
यह विधेयक इसी वर्ष 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था और विपक्षी दलों की मांग के बाद 12 अगस्त को इसे जेपीसी के पास भेजा गया था। विपक्षी दलों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों को अत्यंत आपत्तिजनक बताया था। कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल, राकांपा (एसपी) नेता सुप्रिया सुले, द्रमुक प्रमुख एम.के. स्टालिन, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा, नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियू और मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा सहित कई नेताओं ने इस पर चिंता जताई है।
विपक्ष का आरोप है कि यह कानून अल्पसंख्यकों और ईसाई संस्थाओं के वित्तपोषण को प्रभावित करेगा। कुछ अमेरिकी सांसदों की ओर से आई प्रतिक्रिया को भी भारत ने खारिज करते हुए इसे देश का आंतरिक मामला बताया है। वहीं, सरकार ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह कानून किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विदेशी वित्तपोषण में पारदर्शिता लाना है। विधेयक के ‘खतरनाक’ होने के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि यह कानून उनके लिए खतरनाक है, जो विदेशी धन का इस्तेमाल जबरन धर्म परिवर्तन या निजी स्वार्थ के लिए करते हैं।


