रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) के अध्यक्ष और सभी सदस्यों के पद लगभग तीन महीनों से खाली पड़े हुए हैं, जिसके कारण आयोग का कामकाज पूरी तरह से ठप हो गया है। हालांकि आयोग के अधिकारी और कर्मचारी नियमित रूप से कार्यालय आ रहे हैं, लेकिन समय बिताकर शाम को लौट रहे हैं। झारखंड हाईकोर्ट ने 10 सितंबर को राज्य सरकार को दो महीने के भीतर अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक इस पर कोई अमल नहीं हो सका है। अदालत ने सरकार को 18 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट जमा करने को कहा है, ताकि मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को हो सके।

इस्तीफा और कानूनी पेचीदगियां
सीआईडी जांच के क्रम में जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने 22 जुलाई 2026 को इस्तीफा दे दिया था। वहीं, तीनों सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्य, डॉ. अनिमा हांस्दा और डॉ. जमाल अहमद ने 9 अगस्त 2026 को इस्तीफा दे दिया था। इन इस्तीफों के बाद से आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है। इसके अलावा, कोर्ट ने फिर 18 नवंबर तक अनुपालन रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है। जुलाई में अध्यक्ष और अगस्त में सदस्य के इस्तीफे के बाद स्थिति यह है कि आयोग में नियुक्तियों पर रोक लगी हुई है।
इन परीक्षाओं और प्रक्रियाओं की गति थमी
आयोग के खाली रहने और परीक्षाओं के रद्द होने से छात्रों के भविष्य पर संकट गहरा गया है। जेपीएससी के परीक्षा कैलेंडर के मुताबिक संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा रेगुलर 2025, सिविल सेवा बैकलॉग 2023 व 2025 की परीक्षा, सिविल जज, एपीपी, फैक्ट्री इंस्पेक्टर, प्रोजेक्ट मैनेजर और बॉयलर इंस्पेक्टर, झारखंड पात्रता परीक्षा आदि परीक्षाएं अटकी हुई हैं। जुलाई में आयोग ने नौ परीक्षाओं को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया था, वहीं सरकार ने भी सभी परीक्षाओं की जांच कराने का आदेश दिया है। हालांकि जांच के लिए उच्चस्तरीय कमेटी के गठन की घोषणा के बावजूद अभी तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
विश्वविद्यालय शिक्षकों की प्रोन्नति और एरियर का नुकसान
जेपीएससी में पद खाली रहने का असर सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं पर ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की प्रोन्नति पर भी पड़ा है। शिक्षकों की प्रोन्नति लंबित होने से उन्हें वेतन और एरियर का भारी नुकसान हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पात्रता और प्रोन्नति की वास्तविक तिथि से वित्तीय लाभ मिलने का रास्ता साफ हुआ था, लेकिन जितनी देर से प्रोन्नति होगी, शिक्षकों का बकाया वेतन-अंतर उतना ही बढ़ता जाएगा।
2008 बैच के शिक्षक वर्ष 2023 में ही प्रोफेसर बनने योग्य हो गए थे, लेकिन आयोग में स्टेज टू से थ्री और फिर प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति फंसी हुई है। इतना ही नहीं, 2008 बैच से पहले के वर्षों के भी कई शिक्षकों की प्रोन्नति रुकी हुई है। कुल मिलाकर लगभग 60 शिक्षक इस दायरे में शामिल हैं। प्रोफेसर के रूप में आवश्यक अनुभव पूरा नहीं होने के कारण कई शिक्षक कुलपति और प्रतिकुलपति पद की पात्रता से बाहर हो रहे हैं और कई शिक्षक तो प्रोन्नति की प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।


