
फिल्मों और वेब सीरीज में अपनी अलग पहचान बना चुकीं मिथिला पालकर का मानना है कि हर कलाकार की कुछ व्यक्तिगत सीमाएं होती हैं। कोई कलाकार किन दृश्यों, संवादों या परिस्थितियों में सहज है और किनमें नहीं, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद और सोच पर निर्भर करता है। मिथिला अपने लिए यह सीमा रेखा सहजता और असहजता के आधार पर तय करती हैं। उनका कहना है कि किसी भी भूमिका को स्वीकार करने से पहले वह स्क्रिप्ट की जरूरत और पात्र की मांग को ध्यान से समझती हैं।
असहज होने पर रखती हैं खुलकर अपनी बात
मिथिला बताती हैं कि यदि किसी दृश्य या संवाद को लेकर उन्हें असहज महसूस होता है, तो वह निर्देशक से खुलकर चर्चा करती हैं। उनका उद्देश्य किसी रचनात्मक समाधान तक पहुंचना होता है ताकि कहानी और किरदार दोनों के साथ न्याय हो सके। हालांकि यदि कोई बात उन्हें पूरी तरह अस्वीकार्य लगती है, तो वह साफ तौर पर बता देती हैं कि वह उसे नहीं कर पाएंगी। गाली-गलौज वाले संवादों पर भी उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक है। यदि वह पात्र के स्वभाव का हिस्सा हो तो उन्हें आपत्ति नहीं होती, लेकिन अनावश्यक होने पर वह उससे बचना पसंद करती हैं। मिथिला का यह स्पष्ट और संतुलित रवैया कलाकारों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण माना जा सकता है।

