
नई दिल्ली : क्या आपका बच्चा भी दिनभर मोबाइल या टीवी स्क्रीन से चिपका रहता है? अगर हां, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। डिजिटल उपकरणों के बढ़ते चलन ने बच्चों से उनका स्वाभाविक खेल छीन लिया है। गुरुवार को ‘अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस’ के अवसर पर पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर भवनीत भारती ने अभिभावकों को आगाह किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के संपूर्ण विकास और सुरक्षित भविष्य के लिए मोबाइल की स्क्रीन नहीं, बल्कि बाहरी खेल-कूद सबसे ज्यादा जरूरी है। प्रो. भारती ने बताया कि खेलना ही बच्चों का असल काम है। खेलों के जरिए वे संवाद करना, समस्याएं सुलझाना और अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखते हैं। अत्यधिक स्क्रीन टाइम से छोटे बच्चों में भाषा का विकास देरी से होने, एकाग्रता की कमी, नींद की समस्या और अन्य समस्याएं होने लगती है।
‘इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स (2026)’ के हालिया अध्ययन के अनुसार, 68 प्रतिशत बच्चे 18 महीने की उम्र से पहले ही स्क्रीन के संपर्क में आ जाते हैं। लगभग एक तिहाई बच्चे रोज एक घंटे से ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं। इससे उनके शारीरिक कौशल और सामाजिक विकास में बाधा आती है। इसके विपरीत, जो बच्चे एक घंटे से कम स्क्रीन देखते हैं, उनकी संवाद क्षमता काफी बेहतर पाई गई है। प्रो. भारती ने सलाह दी है कि शुरुआती वर्षों में बच्चों को स्क्रीन से बिल्कुल दूर रखें। उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रेरित करें और कहानियां सुनाएं। इस वर्ष खेल दिवस की थीम ‘खेल बचाएं, बचपन बचाएं’ का जिक्र करते हुए उन्होंने समाज व स्कूलों से बच्चों के लिए सुरक्षित खेल का माहौल बनाने की अपील की है।

