
दयानंद राय
प्रणव झा बड़ी उम्मीद से महागठबंधन का उम्मीदवार बनकर राज्यसभा चुनाव के मैदान में आए थे। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उनके सिर पर हाथ था और महागठबंधन के घटक दलों के पास दो उम्मीदवार जिताने लायक आवश्यक बहुमत भी था। पर जब गुरुवार को राज्यसभा चुनाव के नतीजे आए तो प्रणव झा को निराशा हाथ लगी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनके और वैद्यनाथ राम के साथ विजयी मुद्रा में हाथ उठाकर जब तस्वीरें खिंचाई थी, उस समय तो उन्हें लगा होगा कि अब राज्यसभा और तब राज्यसभा लेकिन नतीजे तस्वीर से मिली प्रसन्नता के अनुकूल न थे। हारने के बाद जब प्रणव झा झारखंड विधानसभा से बाहर निकले तो मायूसी न चाहने के बावजूद उनके चेहरे से झलकती दिखी। उन्हें न तो मल्लिकार्जुन खड़गे का करीबी होना काम आया और न महागठबंधन के विधायकों में ही उन्हें लेकर उत्साह नजर आया। वैसे भी चुनाव जीतनेवाले परिमल नाथवाणी झारखंडी विधायकों और दलों की खासियत और कारगुजारियों से अच्छी तरह वाकिफ थे। वे झारखंड से पहले भी राज्यसभा जा चुके थे और यहां काम भी उन्होंने ठीक किया था। तो वे सबकुछ सेट करके आए थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि एनडीए के वोट उन्हें मिल जायेंगे और बाकी वोटों का जुगाड़ कैसे लगाना है इसका भी फूलप्रूफ प्लान उनके पास था। चुनाव लड़ने से पहले वो आए और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिले। पर जीतने के बाद नहीं मिले। वे आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो से मिले। बाकी का काम उनके करीबियों ने कर दिया। तो इसके बाद तो जीत का सेहरा उनके सिर बंधना तय था। अब प्रणव झा सोच रहे होंगे कि चुनाव लड़कर ही गलती की। पहले समीकरण समझ लेना था। ये समझ लेना था कि खाली बड़े नेता का करीबी होना और आश्वासनों को वास्तविकता समझ लेना राज्यसभा चुनाव में काम नहीं आता है। हार के बाद जब मायूसी का साया उनके जेहन से हटा होगा तो वे समझ गए होंगे कि राज्यसभा चुनाव में वोटिंग का गणित इतना सिंपल नहीं है जितना उन्होंने समझा था।

