रांची : प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने SIR को लेकर कांग्रेस के आंदोलन पर भाजपा के बयान पर कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा की राजनीति अब सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को बदनाम करने तक सिमट गई है। जब कांग्रेस मतदाता सूची की पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के नाम और मतदान के अधिकार की सुरक्षा पर सवाल उठाती है, तो भाजपा को जवाब देने के बजाय राजनीतिक अवसरवाद याद आने लगता है। भाजपा बताए कि उसे मतदाता के अधिकार की चिंता है या केवल कांग्रेस के आंदोलन को बदनाम करने की बेचैनी?

राकेश सिन्हा ने कहा कि भाजपा प्रवक्ता का बयान राजनीतिक हताशा का नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की कोशिश का उदाहरण है। भाजपा कांग्रेस से BLA की संख्या पूछ रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि मतदाता सूची से जुड़ी शिकायतों के समाधान, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर वह कौन-सा ठोस पक्ष रखती है। BLA का नाम लेकर भाजपा मतदाता के मूल सवाल को दबा नहीं सकती। बूथ एजेंट की सक्रियता जरूरी है, लेकिन उससे निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा कि भाजपा का यह तर्क कि SIR की प्रक्रिया सरकारी अधिकारियों के माध्यम से संचालित हो रही है, इसलिए कांग्रेस को सवाल नहीं उठाने चाहिए, लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी समझ पर ही सवाल खड़ा करता है। सरकारी व्यवस्था में काम होने का अर्थ यह नहीं कि हर कदम त्रुटिहीन है और किसी को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो भाजपा शिकायतों के निपटारे, आवेदन की स्थिति और मतदाता सूची में सुधार से संबंधित तथ्य सामने रखने की मांग का समर्थन करे। सवालों से इतनी परेशानी क्यों, यदि व्यवस्था पर भरोसा है तो तथ्यों के साथ जवाब दीजिए!
राकेश सिन्हा ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह मतदाता सूची जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बनाना चाहती है। कांग्रेस की आवाज को राजनीतिक नौटंकी बताने से किसी मतदाता की समस्या समाप्त नहीं होती। किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने की शिकायत हो, आवेदन के निपटारे में परेशानी हो या नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर भ्रम हो, इन सभी विषयों पर निष्पक्ष जवाब और समाधान जरूरी है। भाजपा को बताना चाहिए कि वह इन सवालों पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाने के पक्ष में है।
उन्होंने कहा कि भाजपा बार-बार कांग्रेस से आंकड़े और प्रमाण मांगकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस किसी भी वास्तविक शिकायत को प्रमाण सहित संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष उठाने के पक्ष में है। लेकिन भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह प्रत्येक शिकायत की निष्पक्ष जांच, पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने की उचित प्रक्रिया और गलत तरीके से नाम हटने की शिकायतों के समाधान के लिए जवाबदेही तय करने का समर्थन करती है? भाजपा को सवालों का राजनीतिक तमाशा बनाने के बजाय मतदाताओं के हित में पारदर्शिता की मांग के साथ खड़ा होना चाहिए।
राकेश सिन्हा ने कहा कि सोनिया गांधी और बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर पुराने आरोपों का सहारा लेना वर्तमान SIR से जुड़े सवालों का उत्तर नहीं है। यदि भाजपा के पास किसी आरोप के समर्थन में ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें सक्षम प्राधिकारियों के सामने रखे। लेकिन आरोपों को बार-बार दोहराकर वर्तमान मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। भाजपा को आरोपों की राजनीति छोड़कर यह बताना चाहिए कि आज की मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर उसका तथ्यात्मक जवाब क्या है।
उन्होंने कहा कि फॉर्म-6 और फॉर्म-8 की सुविधाओं का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि पात्र मतदाताओं को सही जानकारी मिले, आवेदन नियमानुसार निपटाए जाएं, शिकायतों का समाधान हो और किसी भी नागरिक को उसके मताधिकार से अनुचित रूप से वंचित न होना पड़े। भाजपा को इन मुद्दों पर कांग्रेस को उपदेश देने के बजाय पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया के पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
राकेश सिन्हा ने कहा कि कांग्रेस का संघर्ष किसी राजनीतिक दल की सुविधा या असुविधा के आधार पर नहीं चलेगा। मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार का सवाल लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ा है। विपक्ष का काम सवाल उठाना है और संबंधित संस्थाओं का दायित्व है कि वे नियमों के अनुसार निष्पक्षता से उन सवालों का समाधान करें।
अंत में राकेश सिन्हा ने कहा कि भाजपा को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि कांग्रेस पर आरोप लगाकर वह मतदाता सूची से जुड़े सवालों को दबा देगी। कांग्रेस न भाजपा की राजनीतिक नसीहतों से डरने वाली है और न लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के अपने दायित्व से पीछे हटने वाली है। भाजपा को कांग्रेस को बदनाम करने की राजनीति छोड़कर तथ्यों पर बात करनी चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता का वोट किसी पार्टी की जागीर नहीं है और उसके अधिकारों की रक्षा पर सवाल उठाना कोई राजनीतिक नौटंकी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग है।


