40 साल से संघर्ष की मिसाल: 72 की उम्र में भी रोज 8 किमी पैदल चलकर रिक्शा चलाते हैं सदन दास

72 वर्षीय सदन दास पिछले 40 वर्षों से रोज 8 किलोमीटर पैदल चलकर रिक्शा चलाते हैं। उनका संघर्ष, अनुशासन और आत्मसम्मान आज भी समाज के लिए प्रेरणा बना हुआ है।

Razi Ahmad
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Saraykela News : ग्राम भंडारी साई से प्रतिदिन लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलकर सरायकेला बाजार आना, किराये पर रिक्शा लेना, दिनभर मेहनत करना और रात लगभग 9 बजे बाजार के अंतिम रिक्शावाले के रूप में घर लौट जाना—पिछले लगभग 40 वर्षों से उनकी यही दिनचर्या है। तपती धूप हो, मूसलाधार बारिश हो या कड़ाके की ठंड, उनके कदम कभी नहीं रुके।

72 वर्ष की उम्र में भी उनका संघर्ष, अनुशासन और आत्मसम्मान आज भी वैसा ही है जैसा वर्षों पहले था। वे स्वयं खाना बनाते हैं, खाते हैं और अगली सुबह फिर उसी मेहनत भरे सफर पर निकल पड़ते हैं। उन्होंने विवाह नहीं किया और आज अपने भतीजे-भतीजियों के साथ रहते हैं।

तांती समाज (परंपरागत कपड़ा बुनकर समुदाय) से आने वाले सदन दास का जीवन किसी बड़े पद, धन या प्रसिद्धि की कहानी नहीं है। यह एक साधारण इंसान के असाधारण जज़्बे, मेहनत और आत्मसम्मान की कहानी है।

सदन दास केवल मेहनती ही नहीं, बल्कि शिक्षित भी हैं। वे हिंदी, उड़िया और अंग्रेज़ी तीनों भाषाएँ पढ़-लिख सकते हैं। जब कोई दूसरे रिक्शाचालक दुकानों का नाम पढ़वाकर सामान पहुँचाते थे, तब वे स्वयं दुकान का नाम पढ़कर सही स्थान तक सामान पहुँचाते हें।

पुल बनने से पहले का वह दौर आज भी कई लोगों को याद होगा। नदी पार करने के लिए नाव ही एकमात्र सहारा थी और हर शाम सरायकेला बस स्टैंड से एक बुलंद आवाज़ सुनाई देती थी— वह आवाज़ थी सदन दास की।

दिनभर की मेहनत के बाद आख़िरी नाव पकड़ने की जल्दी में वे दूर से ही आवाज़ लगाते हुए दौड़ पड़ते थे। उनकी पहचान ऐसी थी कि राह चलते लोग भी उनकी आवाज़ को आगे बढ़ाते जाते थे। देखते ही देखते वह आवाज़ बस स्टैंड से नाव घाट तक पहुँच जाती थी और नाविक समझ जाता था कि — “सदन आ रहा है।”

समय की पाबंदी का आलम यह था कि कई बार नाव घाट छोड़ चुकी होती थी और नदी की ओर बढ़ने लगती थी। लेकिन सदन दास ठीक उसी अंतिम क्षण पर पहुँचते और नाव के आख़िरी सिरे से अंतिम यात्री के रूप में सवार हो जाते थे। यह दृश्य वर्षों तक लगभग हर शाम देखने को मिलता था।

आज पुल बन चुका है, नावों का वह दौर भी बीत गया है, लेकिन सरायकेला के पुराने लोगों के मन में सदन दास की वह बुलंद आवाज़, उनका संघर्ष और समय के प्रति उनका अनुशासन आज भी उसी तरह गूंजता है।

लेकिन मेरे लिए उनकी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा कुछ और है। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद जब वे थके हुए रात लगभग 8:30 बजे किसी चाय की दुकान पर मुझे देखते हैं, तो मुस्कुराते हुए मेरे पास आ बैठते हैं। एक गिलास पानी और एक कप चाय के साथ 15-20 मिनट की बातचीत होती है।

बड़े संतोष के साथ वे दिनभर की कमाई का हिसाब बताते हैं— आज ₹200 या ₹250 कमाए, जिसमें से ₹30 रिक्शे का किराया चला जाएगा और बाकी बच जाएगा।

उनके चेहरे की संतुष्टि, सादगी और आत्मसम्मान मुझे भीतर तक छू जाता है। मुझे हमेशा लगता है कि कभी-कभार उन्हें एक कप चाय पिलाना और उनके हाल-चाल पूछ लेना, शायद कई बड़े पुण्य कर्मों से भी बड़ा सुख देता है। क्योंकि वहाँ दान नहीं होता, वहाँ इंसानियत होती है; वहाँ सहायता नहीं, बल्कि सम्मान होता है।

सदन दास जी से मेरा परिचय कोई आज का नहीं है। वर्षों से मैं उनके संघर्ष, अनुशासन और आत्मसम्मान को देखता आ रहा हूँ। आज जब उन्हें देखा, तो उनके जीवन का पूरा संघर्ष मेरी आँखों के सामने चलचित्र की तरह तैरने लगा।

मुझे लगा कि ऐसे लोगों की कहानियाँ केवल सुनकर भुला देने के लिए नहीं होतीं, बल्कि समाज के सामने एक मिसाल के रूप में रखी जानी चाहिए। शायद इसी भावना ने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया। आज के दौर में, जब लोग सुविधाओं के बीच भी संघर्ष की शिकायत करते हैं, सदन दास जैसे लोग हमें सिखाते हैं कि जीवन की असली ताकत मेहनत, आत्मसम्मान और निरंतर कर्म में होती है। सचमुच, कुछ लोग इतिहास की किताबों में नहीं मिलते, लेकिन अपने कर्मों से समाज के दिलों में अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

सदन दास ऐसे ही एक साधारण दिखने वाले असाधारण इंसान हैं।

सरायकेला के इस कर्मयोगी को हृदय से नमन….

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।