नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश देना न तो दंडात्मक होता है और न ही इससे उसकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच आती है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे आदेश से कर्मचारी के आचरण पर कोई सवाल नहीं उठता और न ही इसका अर्थ यह है कि वह कदाचार का दोषी पाया गया है। न्यायमूर्ति मनमोहन एवं न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 14 कर्मचारियों में से पांच को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के छत्तीसगढ़ सरकार के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि ऐसा फैसला सक्षम प्राधिकारी के इस आकलन पर आधारित होता है कि संबंधित कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना अब जनहित में नहीं है।

पीठ ने कहा, ‘‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश न तो दंडात्मक होता है और न ही इससे कर्मचारी की प्रतिष्ठा पर कोई आंच आती है। ऐसे आदेश से कर्मचारी के आचरण पर कोई सवाल नहीं उठता और न ही यह माना जा सकता है कि वह किसी कदाचार का दोषी पाया गया है।’’ न्यायालय ने कहा, ‘‘किसी अधिकारी की कार्यक्षमता समाप्त हो गई है या उसे सेवा में बनाए रखना प्रशासनिक दक्षता के लिए नुकसानदेह होगा, इसका अंतिम आकलन करना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, ऐसा आकलन महज अटकलों या मनमर्जी पर आधारित नहीं हो सकता। इसके लिए रिकॉर्ड में उपलब्ध ठोस और प्रासंगिक सामग्री का होना जरूरी है।’’

शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 12 अप्रैल, 2023 के आदेश को बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को सही ठहराया था, जिसमें कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने संबंधी राज्य सरकार के 2017 के परिपत्र को बरकरार रखा गया था। न्यायालय ने कहा, ‘‘कोई कर्मचारी केवल इस आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को सफलतापूर्वक चुनौती नहीं दे सकता कि उसके समान सेवा रिकॉर्ड वाले किसी अन्य अधिकारी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की गई।’’न्यायालय ने कहा कि किसी कर्मचारी की उपयोगिता, ईमानदारी, कार्यकुशलता और समग्र सेवा रिकॉर्ड का आकलन व्यक्तिगत स्तर पर किया जाता है तथा सक्षम प्राधिकारी संबंधित कर्मचारी के रिकॉर्ड के आधार पर यह आकलन करता है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता का सिद्धांत एक सकारात्मक अवधारणा है और यह नकारात्मक समानता के दावे को स्वीकार नहीं करता।’’ पीठ ने कहा, ‘‘यह न्यायालय लगातार कहता रहा है कि यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से कोई लाभ मिला है या उसके मामले में कोई चूक हुई है, तो दूसरा व्यक्ति इस आधार पर अपने लिए भी उसी लाभ का दावा नहीं कर सकता। पहले किसी मामले में हुई गलती को आधार बनाकर दूसरे मामले में वही गलती नहीं दोहराई जा सकती।’’ शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि सरकार ने किसी अधिकार के इस्तेमाल के लिए नियम या मानदंड तय किए हैं, तो अदालत केवल यह जांच कर सकती है कि उनका पालन किया गया है या नहीं।
न्यायालय ने कहा, ‘‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट, ईमानदारी और कार्य प्रदर्शन के आकलन तथा सेवा रिकॉर्ड में दर्ज अन्य प्रासंगिक जानकारियों पर आधारित होना चाहिए, जिनसे यह तय किया जा सके कि संबंधित कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना जनहित में है या नहीं।’’ न्यायालय ने कहा कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश में न्यायिक हस्तक्षेप केवल तभी उचित है, जब यह साबित हो कि फैसला बिना किसी साक्ष्य के लिया गया, संबंधित तथ्यों पर विचार नहीं किया गया, निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना या अनुचित है अथवा दुर्भावना से प्रेरित है। प्रभावित कर्मचारियों के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था।
न्यायालय ने कहा कि जांच समिति की सिफारिशें संबंधित कर्मचारियों की उपयोगिता, कार्यकुशलता और सेवा में बने रहने की उपयुक्तता के वस्तुनिष्ठ आकलन पर आधारित थीं और इसका उद्देश्य प्रशासनिक मानकों को बनाए रखना और सरकारी सेवाओं में दक्षता सुनिश्चित करना था। पीठ ने कहा कि सभी कर्मचारियों के रिकॉर्ड की जांच के बाद ही जांच समिति ने ऐसे पांच कर्मचारियों की पहचान की, जिनका समग्र सेवा रिकॉर्ड निर्धारित मानकों से नीचे था और जिनकी हालिया गोपनीय रिपोर्ट से असंतोषजनक कार्य प्रदर्शन, घटती कार्यकुशलता या सरकारी सेवा में उनकी उपयोगिता कम होने के संकेत मिले थे।
न्यायालय ने कहा कि शेष नौ कर्मचारी निर्धारित मानकों पर खरे उतरे थे और उन्हें सेवा में बनाए रखने के योग्य पाया गया था।


