किसी विश्वविद्यालय में नेताओं का निर्माण कैसे होता है? कक्षाओं में, छात्रावासों में या फिर छात्र राजनीति के मैदान में? इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में एक ऐसा कुआँ भी रहा है, जिसे कभी नेताओं की पाठशाला और सियासत की प्रयोगशाला कहा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस कुएँ से सिर्फ प्यास ही नहीं बुझती थी, बल्कि कई राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी पानी मिलता था। यही वजह है कि इसकी पहचान ‘नेता निर्माण कूप’ के रूप में बन गई।

दरअसल, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव हुआ करते थे, तब आज का भव्य छात्रसंघ भवन अस्तित्व में नहीं आया था। उस दौर में विश्वविद्यालय परिसर का यह कुआँ छात्रों की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इसके चबूतरे पर बैठकर छात्र नेता चुनावी रणनीतियाँ बनाते, समर्थकों से विचार-विमर्श करते और अपने प्रतिद्वंद्वियों की राजनीतिक चालों का आकलन करते थे।

लेकिन इस कुएँ की असली पहचान थी यहां होने वाले दक्षता भाषण। छात्रसंघ चुनाव से पहले प्रत्याशी इसी कुएँ के पास खड़े होकर छात्रों के सामने अपनी बात रखते थे। घंटों भाषण होते, तर्क-वितर्क चलते और छात्र अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के समर्थन में जुटते थे। यह किसी चुनावी सभा से कम नहीं होता था। यहां दिए गए भाषण ही छात्र नेताओं की लोकप्रियता और वक्तृत्व-कला की परीक्षा हुआ करते थे।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता श्याम कृष्ण पांडेय के अनुसार, कुएँ के आसपास की जगह को उस समय ‘फक्कड़ का चौराहा’ भी कहा जाता था। विश्वविद्यालय में एक बजे तक कक्षाएं चलती थीं। इसके बाद छात्र-छात्राओं की महफिल इसी कुएँ के पास सजती थी। छात्रसंघ चुनाव के परिणाम आने से पहले ही यहां जुटने वाली भीड़ से चुनावी माहौल का अंदाजा लगने लगता था।
इस कुएँ का राजनीतिक महत्व इतना था कि आपातकाल के दौरान 26 जून 1975 को पुलिस ने इसके चारों ओर कंटीले तार लगा दिए थे। उद्देश्य था कि छात्र नेता यहां इकट्ठा होकर सरकार के खिलाफ कोई रणनीति न बना सकें। प्रोफेसर शास्त्री बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब सुबह विश्वविद्यालय खुलते ही इस कुएँ पर सियासी चर्चाओं की महफिल सज जाती थी और दिनभर भाषणों का सिलसिला चलता रहता था।
इस कुएँ से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की भी है। वर्ष 1949 में जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए, तो उन्होंने पहली बार इसी कुएँ पर भाषण दिया था। कहते हैं कि वे घंटों बोलते रहे और बोलते-बोलते उनका गला सूख गया। तब उन्होंने इसी कुएँ का पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। आगे चलकर यही छात्र नेता देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा। इस ऐतिहासिक कुएँ का संबंध केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं था। शहीद लाल पद्मधर ने इसी कुएँ के चबूतरे पर बैठकर जिला कचहरी में तिरंगा फहराने की रणनीति बनाई थी। हालांकि, इस साहसिक प्रयास में अंग्रेजी पुलिस की गोलियों ने उनकी जान ले ली।
कहा जाता है कि इस कुएँ के चबूतरे पर बैठकर कभी पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, पूर्व उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, मदन मोहन मालवीय, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, गुलजारी लाल नंदा, हेमवती नंदन बहुगुणा, मदन लाल खुराना, जनेश्वर मिश्र, कमला बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे अनेक राजनीतिक व्यक्तित्वों ने विचार-विमर्श किया था।
आज विश्वविद्यालय परिसर में यह कुआँ भले ही अपनी पुरानी राजनीतिक हलचल और रौनक खो चुका हो, लेकिन इसका इतिहास इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उस परंपरा की याद दिलाता है, जहां राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों को व्यक्त करने, बहस करने और नेतृत्व सीखने का अभ्यास भी हुआ करती थी।
यह महज पानी का कुआँ नहीं था। यह वह जगह थी, जहां भाषणों से पहचान बनती थी, बहसों से विचार पैदा होते थे और विश्वविद्यालय की गलियों से निकलकर कई छात्र देश की राजनीति के बड़े मंच तक पहुंचे थे। सचमुच, इलाहाबाद विश्वविद्यालय का यह कुआँ अपने नाम के अनुरूप नेताओं का निर्माण करता था।


