1942 की क्रांति : सूर्यानंद अखौरी को 24 अगस्त को लेस्लीगंज में गिरफ्तार किया गया था

Archana Ekka
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प्रभात मिश्रा

नौ अगस्त 1942 से शुरू हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का असर पलामू के ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैलने लगा था। लेस्लीगंज (आज का नीलांबर पीतांबर पुर) भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां के लोगों का नेतृत्व पांकी प्रखंड के डंडार कला निवासी सूर्यानंद अखौरी कर रहे थे। लेस्लीगंज थाने में सात कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पकड़ कर रखा गया था। सूर्यानंद अखौरी के नेतृत्व में आंदोलनकारियो ने कार्यकर्ताओं को छुड़ाने का प्रयास किया। डालटनगंज के आए सशस्त्र दल ने इन लोगों को भगा दिया और सूर्यानंद अखौरी सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। वे डालटनगंज व हजारीबाग में करीब डेढ़ साल तक जेल में रहे।

सूर्यानंद अखौरी के त्याग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस समय वे जेल में थे उसी समय उनके पहले बेटे का जन्म हुआ था। जब वह बीमार पड़ा तो तात्कालिक उचित इलाज की व्यवस्था नहीं होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। बाद में शोक में डूबी उनकी पत्नी की भी मौत हो गई। इन दो हृदय विदारक घटनाओं के बाद भी सूर्यानंद अखौरी का मनोबल नहीं टूटा। वह सजा पूरी करने के बाद ही रिहा हुए। उनका जन्म पलामू जिले के पांकी प्रखंड के डंडार कला ग्राम में 10 सितंबर 1907 को हुआ था इनके पिता का नाम अखौरी गोखुलानंद और माता का नाम श्रीमती अनारकली देवी था। इनके पिता अंग्रेजी हुकुमत के दारोगा थे, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि मात्र 11 साल की उम्र में ही इनके ऊपर दे पिता का साया उठ गया।

अब इनके लालन पालन की सारी जिम्मेवारी माँ पर ही आई, जो बिलकुल ही अशिक्षित थी। इनके बड़े‌ भाई का नाम मंगलानंद अखौरी था जो इनसे तीन साल बड़े थे। इनकी स्कूली शिक्षा डालटनगंज में हुई। मैट्रिक की परीक्षा पास करके वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी चले गये । वहाँ के उन्होंने आईए पास किया। उस समय वहाँ के प्राचार्य महामना पंडित मदन मोहन मालवीय थे। इसी बीच देश में गाँधी जी का आन्दोलन चल रहा था। वे आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे तथा अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध लोगों को जागृत करने लगे। जगह – जगह सभाएँ करके अंग्रेजी हुकुमत की त्रुटियों से लोगों को अवगत कराने लगे।

वे दस साल तक पलामू जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे। इसी बीच उन्होंने गांव में सड़क का निर्माण करवाया। पहले गांव के लोगों को मेन जगह में आने के लिए पगडंडी का सहारा लेना पड़ता था। डंडार कला गांव में न कोई विद्यालय था और न ही कोई अस्पताल इन्होंने ही अपने कार्यकाल में एक प्राइमरी विद्यालय की स्थापना की व एक आयुर्वेदिक दवाखाना भी खुलवाया। अब गांव के लोगों के लिए अपनी छोटी बीमारियों के लिए चार मील पैदल चलकर नहीं जाना पड़ता था। अपने इन कार्यों के लिए वे गांव में काफी प्रसिद्ध हो चुके थे।

उनकी दूसरी शादी 1949 में हुई। इनकी पत्नी को नाम श्रीमती विद्याधारी देवी था। जिससे उनकी सात बेटियाँ व एक बेटा हैं। बेटे अच्युतानंद अखौरी मेदिनीनगर कोर्ट में वकालत करते है। उनकी पहली बेटी शकुंतला कुमारी हैं, जो पटना में विवाहित है। इनके पति जी अजित कुमार प्रमाद पुरातत्व विभाग के निदेशक से अवकाश प्राप्त कर चुके है। दूसरी लड़की शैल अखौरी हैं जो रांची में रहती हैं। उनकी तीसरी लड़की सुमन अखौरी, चौथी लड़की कामिनी कुमारी, पांचवी लड़‌की सुनीता अखौरी, छठी लड़की संगीता कुमारी और सातवी लड़की शैलजा अखौरी हैं।

सूर्यानंद अखौरी को स्वतंत्रता के पच्चीसवें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगगदान के लिए राष्ट्र की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र भेंट किया था। दो जनवरी 1982 में उनका निधन रांची में हो गया। उनकी स्मृति में पांकी सह अंचल कार्यालय परिसर में शिलापट्ट लगाया गया है लेकिन आज जर्जर हालत में है।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।