
- महुआडांड़
महुआडांड़ : झारखंड की पवित्र भूमि पर एक ऐसा स्थान है जहां समय थम सा जाता है और आत्मा को शांति मिलती है। महुआडांड़ से महज 30 किलोमीटर दूर, गुमला जिले के डुमरी प्रखंड की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित टांगीनाथ धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि त्रेता युग से चली आ रही आस्था की अमर गाथा है।
त्रेता युग से जुड़ी दिव्य कथा: परशुराम की तपोस्थली

पौराणिक मान्यता है कि जब जनकपुर में भगवान श्रीराम ने शिव धनुष को तोड़कर सीता माता से विवाह किया, तो परशुराम जी को लगा कि उनके आराध्य शिव का अपमान हुआ है। क्रोध में आकर उन्होंने लक्ष्मण से संवाद किया। लेकिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीराम स्वयं भगवान नारायण के अवतार हैं, तो परशुराम जी को गहरा आत्मबोध हुआ।अपने क्रोध पर पश्चाताप करने के लिए वे इसी घने वन और दुर्गम पर्वत श्रृंखला में आए।
यहीं उन्होंने भगवान शिव की स्थापना कर कठोर तपस्या की। तप के प्रतीक स्वरूप उन्होंने अपना दिव्य अस्त्र परशु इसी पावन धरती में स्थापित कर दिया। तभी से यह स्थान टांगीनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ – अर्थात जहां परशु टांगा गया। स्थानीय मान्यता है कि वह दिव्य परशु आज भी इसी भूमि में विराजमान है और इस स्थान को अद्भुत ऊर्जा प्रदान करता है।
देवताओं की साक्षी: शिव-शनि की अमर गाथा

टांगीनाथ की महिमा यहीं समाप्त नहीं होती। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शिव ने शनिदेव को अनुशासित करने के लिए अपना त्रिशूल चलाया था। वह त्रिशूल उड़ता हुआ इसी शिखर पर आकर स्थापित हो गया। आज भी पहाड़ी की चोटी पर त्रिशूल का अग्रभाग दिखाई देता है। कितना हिस्सा जमीन के भीतर है, यह रहस्य आज तक अनसुलझा है, जो इस स्थान की महिमा को और बढ़ाता है।
प्रकृति की गोद में बसा देवशिल्प

यद्यपि समय के प्रभाव से प्राचीन मंदिर खंडहर में बदल चुका है, लेकिन यहां बिखरे हुए प्राचीन शिवलिंग, पत्थरों पर की गई अद्भुत नक्काशी और कलाकृतियां चीख-चीख कर कहती हैं कि यह देवताओं द्वारा निर्मित स्थल है। चारों ओर घना जंगल, कल-कल करती नदियां और शांत वातावरण इस जगह को ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम बनाते हैं।
सावन में बनता है आस्था का महाकुंभ
जैसे ही सावन का महीना आता है, टांगीनाथ धाम में भक्ति की बयार बहने लगती है। झारखंड के साथ-साथ बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से लाखों शिवभक्त यहां कावर लेकर पहुंचते हैं। “बोल बम” और “हर हर महादेव” के उद्घोष से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है।महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी पैदल यात्रा कर यहां जलाभिषेक करते हैं।
मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है। प्रशासन और स्थानीय समितियों द्वारा सावन में विशेष पूजा, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की जाती है।
विकास की नई उम्मीद
टांगीनाथ धाम झारखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान है। क्षेत्रवासियों और श्रद्धालुओं की मांग है कि इस पावन स्थल का पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में विकास किया जाए, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बना रहे।

