जादूगोड़ा : यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक काचम आनंद राव ने झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में यूरेनियम खदानों और मिलों से निकलने वाले विकिरण को त्वचा संबंधी बीमारियों, कैंसर और जन्मजात विकृतियों जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का कारण होने के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि इस तरह की बीमारियां मुख्य रूप से क्षेत्र के ‘‘पिछड़ेपन’’ और स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ी हैं। राव ने कहा कि राज्य में निकाले जाने वाले यूरेनियम अयस्क की गुणवत्ता बहुत कम है और एक टन अयस्क से केवल 200-300 ग्राम यूरेनियम निकाला जाता है।

उन्होंने कहा कि इसका स्वास्थ्य पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है। राव ने जादूगोड़ा में बातचीत के दौरान कहा, ‘‘कुछ लोग जिन त्वचा संबंधी बीमारियों या कैंसर को यूरेनियम खदानों से जोड़ रहे हैं, उनका कारण यूरेनियम खनन नहीं है। क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियों और पिछड़ापन इनका कारण है। विभिन्न संगठनों ने कम से कम 10 वैज्ञानिक अध्ययन किए हैं, जिनसे साबित हुआ है कि यूरेनियम निकाले जाने और क्षेत्र में पाई जाने वाली बीमारियों के बीच कोई संबंध नहीं है।’’ यूसीआईएल, झारखंड में सात यूरेनियम खदानों में खनन कार्य करती है।
इनमें बागजाता, जादूगोड़ा, भाटिन, नरवापहाड़, तुरामडीह और मोहुलडीह में छह भूमिगत खदानें तथा बंदुहुड़ांग में एक खुली खदान शामिल है। स्थानीय समूह और सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता दशकों से यूसीआईएल की यूरेनियम खनन गतिविधियों की आलोचना करते रहे हैं। उनका आरोप है कि खदानों और मिलों से निकलने वाला विकिरण आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है तथा कैंसर, तपेदिक व जन्मजात विकृतियों जैसी बीमारियों का कारण बन रहा है। भारत की पहली भूमिगत यूरेनियम खदान 1964 में पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा में शुरू हुई थी और वहां अयस्क प्रसंस्करण संयंत्र की शुरुआत 1968 में हुई थी। यूसीआईएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने दावा किया, ‘‘यहां से निकाले जाने वाले यूरेनियम अयस्क की गुणवत्ता बहुत कम है। यहां विकिरण का स्तर समुद्र तटों पर मौजूद विकिरण से भी कम है। संयंत्र में यूरेनियम निकालने के बाद ज्यादातर प्रसंस्कृत सामग्री अवशेष के रूप में बच जाती है, जिसकी रेडियोधर्मिता बहुत कम होती है और यह निर्धारित सीमा से नीचे है।’’
उन्होंने कहा कि यूसीआईएल स्थानीय लोगों के बीच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, ताकि यूरेनियम खनन को लेकर फैली गलत धारणाओं को दूर किया जा सके। यूरेनियम खनन गतिविधियों से जुड़े 47 वर्षीय साई प्रसाद ने दावा किया कि उन्हें अब तक काम के कारण होने वाली किसी बीमारी का सामना नहीं करना पड़ा है। वह नरवापहाड़ में पिछले 18 वर्षों से काम कर रहे हैं। प्रसाद ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं पिछले 18 वर्षों से खदान में काम कर रहा हूं। लेकिन न तो मुझे और न ही मेरे परिवार को विकिरण के प्रभाव या काम के कारण होने वाली किसी बीमारी का सामना करना पड़ा है। मैं यहां पाली प्रभारी हूं। यहां 700 से अधिक लोग काम करते हैं और उनमें से कई दो दशक से अधिक समय से काम कर रहे हैं। खनन गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल रहने के बावजूद उन्हें भी इस तरह का कोई प्रभाव महसूस नहीं हुआ।’’
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के पर्यावरण सर्वेक्षण प्रयोगशाला की स्वास्थ्य भौतिकी इकाई के प्रभारी डॉ. एन. के. शेट्टी ने कहा कि अध्ययनों से पता चला है कि यूरेनियम खदानों में विकिरण संबंधी स्थितियां सुरक्षित हैं और वहां कार्यरत कर्मचारियों के विकिरण के संपर्क में आने की मात्रा सालाना 20 मिलीसीवर्ट की निर्धारित सीमा से काफी कम थी।
उन्होंने कहा, ‘‘छह दशकों से जारी खनन गतिविधियों का पर्यावरण पर प्रभाव नगण्य है।’’


