नयी दिल्ली: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने मंगलवार को भारत के प्राचीन ज्ञान के व्यापक प्रसार पर जोर देते हुए कहा कि यह केवल पांडुलिपियों और पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘हमें अपने महान ग्रंथों को दुनिया से विलुप्त नहीं होने देना चाहिए और उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना चाहिए।’’
उपराष्ट्रपति ने यहां श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि विज्ञान, साहित्य और दर्शन की दुनिया में संस्कृत का गौरवपूर्ण स्थान है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारा प्राचीन ज्ञान केवल पांडुलिपियों और पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे संरक्षित किया जाना चाहिए, इसका अध्ययन और व्याख्या की जानी चाहिए तथा इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय ज्ञान प्रणाली पर जोर देकर इस मिशन को और मजबूत किया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें अपने महान ग्रंथों को दुनिया से विलुप्त नहीं होने देना चाहिए। हमें उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना होगा।’’
यह रेखांकित करते हुए कि संस्कृत में नैतिक मूल्यों का मजबूत आधार है, राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘विज्ञान, साहित्य और दर्शन की दुनिया में संस्कृत का गौरवपूर्ण स्थान है। यही संस्कृत की महानता है। हमें इसे संरक्षित करना चाहिए और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए। यह (संस्कृत भाषा) नैतिक मूल्यों की मजबूत आधार है।’’
उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा, ‘‘जहां हम अपनी मातृभाषा को संजोते हैं, वहीं हमें अन्य भाषाओं का भी सम्मान और महत्व समझना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘संस्कृत ने सदियों से भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया है…यह हमारे सम्मान की अधिकारी है। इसने विभिन्न कलाओं को समृद्ध किया है और सबसे बढ़कर, यह उस सूत्र के रूप में कार्य करती है, जो भारत की आत्मा को एक सूत्र में पिरोता है। संस्कृत भाषा में असंख्य ऐसे विषय समाहित हैं जो मानवजाति के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। संस्कृत अनेक द्वारों की कुंजी है।”
राधाकृष्णन ने कहा, “आज भी दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियां न केवल भारत में बल्कि नेपाल, तिब्बत और चीन जैसे देशों में भी मिलती हैं। ज्ञान भारतम् मिशन की शुरुआत…एक और महत्वपूर्ण कदम है। पांडुलिपियों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये के आधारभूत कोष के साथ, यह भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को भारत और दुनिया के लोगों तक पहुंचा रहा है।”
उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों से इन पांडुलिपियों का अन्वेषण करने, उनका आलोचनात्मक अध्ययन करने, विद्वत्तापूर्ण गहनता के साथ उनका संपादन करने और उनकी ज्ञान-सम्पदा को दुनिया के लिए उपलब्ध कराने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा, “कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में, मैं आपसे संस्कृत को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का भी आग्रह करता हूं।”


