राजा राम मोहन राय जयंती: समाज सुधार और आधुनिक भारत के निर्माण में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

Manu Shrivastava
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आधुनिक भारत के प्रमुख समाज सुधारकों में गिने जाने वाले राजा राम मोहन राय की जयंती आज मनाई जा रही है। उनका जन्म वर्ष 1772 में राधानगर में हुआ था। वे भारतीय समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले पहले बड़े समाज सुधारकों में से एक थे। शिक्षा, महिला अधिकार और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।

बचपन से ही थे बेहद प्रतिभाशाली

राजा राम मोहन राय बचपन से ही असाधारण बुद्धिमत्ता के धनी थे। मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने बंगला, संस्कृत, अरबी और फारसी जैसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई, जिसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें पटना भेजा गया।

वे एकेश्वरवाद के समर्थक थे और बचपन से ही मूर्तिपूजा तथा रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ विचार रखते थे। जबकि उनके पिता रामकांत राय कट्टर हिंदू ब्राह्मण थे।

मतभेद के कारण छोड़ दिया घर

धार्मिक विचारों को लेकर राजा राम मोहन राय और उनके पिता के बीच अक्सर मतभेद होते थे। वे समाज में फैले अंधविश्वास और धर्मांधता के विरोधी थे। कम उम्र में ही उन्होंने घर छोड़ दिया और हिमालय तथा तिब्बत की यात्रा पर निकल पड़े। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का अध्ययन किया।

समाज सुधार के लिए चलाया आंदोलन

राजा राम मोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में भी काम किया। उन्होंने जैन और मुस्लिम धर्म का अध्ययन कर समाज को व्यापक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया।

वे सती प्रथा, बाल विवाह और महिलाओं के प्रति भेदभाव जैसी कुरीतियों के घोर विरोधी थे। उनके प्रयासों से तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाया। उनका मानना था कि वेदों में सती प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए इसे समाज में स्थान नहीं मिलना चाहिए।

महिलाओं के अधिकारों के लिए उठाई आवाज

राजा राम मोहन राय महिलाओं के अधिकारों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने और शिक्षा के अवसर बढ़ाने के लिए संघर्ष किया। उस दौर में जब समाज कुरीतियों में जकड़ा हुआ था, तब वे आधुनिक सोच के साथ बदलाव की दिशा में काम कर रहे थे।

आज भी याद किए जाते हैं उनके योगदान

राजा राम मोहन राय की जयंती हर वर्ष श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। लोग उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। उनके द्वारा स्थापित ब्रह्मो समाज सहित कई संस्थाएं आज भी समाज कल्याण के कार्यों में सक्रिय हैं।

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