
अशोक पांडेय
न जाने किस पक्षपातपूर्ण खब्त के चलते तीस-पैंतीस बरसों तक यह होता रहा कि फ़िल्मी गीतों में औरत की आवाज़ का मतलब या तो लता होता या आशा। उस युग में किसी तीसरे स्त्री स्वर का पनपना नामुमकिन बना दिया गया था तो भी गीता दत्त, शमशाद बेग़म, दिलराज कौर जैसी अद्वितीय आवाजों के लिए यादगार जगहें निकल आती थीं। बचपन में यूं हुआ करता कि रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी गानों के रेकॉर्ड बजाया करते और समूचा देश उनके प्रोग्रामों का इंतज़ार किया करता। उनकी सुपरिचित आवाज़ बताया करती कि अगला गाना फलां फिल्म से है, फलां ने लिखा है वगैरह-वगैरह। गाने वाले का नाम आखिर में बताया जाता. कोई एकदम नौसिखुवा भी एकाध बार इस प्रोग्राम को सुन कर भविष्यवाणी कर सकता था कि सौ में से पिच्यानवे गानों में स्त्री-स्वर किसका होगा। हर दूसरा गाना या तो लता का गाया होता या आशा का. ऐसी अभेद्य मोनोपॉली।

टेक्सचर और फ़िल्मी-परफेक्शन के लिहाज़ से सुमन कल्याणपुर की आवाज़ लता मंगेशकर की आवाज़ के बहुत नज़दीक बैठती थी – एक तरह से इसका खामियाजा उन्हें यूं भुगतना पड़ा कि उनके गाये ज़्यादातर गीतों को जनता आज भी लता का गाया समझती है। याद करने की कोशिश कर के देखिये, उनका कौन सा गाना आपका पसंदीदा है. हो सकता है आपको काफी देर सोचना पड़ जाए। 1960 के आसपास जब रॉयल्टी के पैसे को लेकर लता और रफ़ी साहब के बीच मनमुटाव शुरू हुआ, तब संगीतकारों को सुमन कल्याणपुर की याद आई। उन तीन-चार बरसों में उन्हें रफ़ी साहब के साथ डेढ़ सौ के आसपास डूएट हासिल हुए। दोनों का झगड़ा निबटा तो फिर जान बूझ कर अनदेखा किये जाने का वही सिलसिला शुरू हो गया।
हम उन्हें बार-बार भूल जाते थे. अमूमन रेडियो पर किसी अनाउंसर की आवाज़ हमें बार-बार उनकी याद दिला जाया करती – सुमन कल्याणपुर। उन्हें इतना कम सुनाया जाता था कि वे देश की स्मृति के एकदम बाहरी इलाकों में रहने को विवश थीं। फिर रेडियो भी बिलाया। कल वे दुनिया से चली गईं तो दुनिया को फिर से याद आया कि अरे! कैसे! कब! हमने सुमन कल्याणपुर को वाकई उनका हक नहीं दिया। याद कीजिए आपको उनका कौन सा गाना याद है!

