
Jharkhand High Court : झारखण्ड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल सर्विस बुक (सेवा पुस्तिका) उपलब्ध नहीं होने के आधार पर किसी कर्मचारी को प्रोन्नति और उससे जुड़े लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सर्विस बुक नियोक्ता के कार्यालय में सुरक्षित रखी जाने वाली आधिकारिक दस्तावेज होती है, इसलिए उसके गुम होने की जिम्मेदारी कर्मचारी पर नहीं डाली जा सकती।
जनक कुमारी सिन्हा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार और रांची विश्वविद्यालय को मामले में निर्धारित समयसीमा के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार ने अदालत को बताया कि जनक कुमारी सिन्हा की नियुक्ति वर्ष 1981 में लैब इंचार्ज के रूप में हुई थी और वर्ष 2007 में वे सेवानिवृत्त हुईं। वर्ष 2016 में रांची विश्वविद्यालय ने उन्हें पूर्व प्रभाव से डिमॉन्स्ट्रेटर (सेलेक्शन ग्रेड) के पद पर प्रोन्नति प्रदान की थी। हालांकि बाद में विभाग ने उनकी प्रोन्नति को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि सर्विस बुक के अभाव को आधार बनाकर किसी कर्मचारी के वैध अधिकारों को नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने विश्वविद्यालय को चार सप्ताह के भीतर आवश्यक जवाब दाखिल करने और राज्य सरकार को 12 सप्ताह के अंदर पूरे मामले पर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया।
अदालत ने ‘समानता के सिद्धांत’ का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यदि समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को संबंधित लाभ दिए गए हैं, तो जनक कुमारी सिन्हा को भी वही लाभ मिलना चाहिए।
इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निष्पादन करते हुए सरकार और विश्वविद्यालय को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने का आदेश दिया। यह फैसला सेवा संबंधी मामलों में कर्मचारियों के अधिकारों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

