स्कॉट फिशर की आख़िरी चढ़ाई – एक ऐसी कहानी जिसे एवरेस्ट आज भी याद रखता है

माउंट एवरेस्ट 1996 की त्रासदी में पर्वतारोही स्कॉट फिशर की बहादुरी और संघर्ष की कहानी आज भी प्रेरित करती है, जिन्होंने अंतिम सांस तक साथियों की मदद और हिम्मत नहीं छोड़ी।

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साल 1996 में माउंट एवरेस्ट पर हुई त्रासदी दुनिया की सबसे चर्चित पर्वतारोहण दुर्घटनाओं में गिनी जाती है। उस दिन कई लोगों की जान गई, लेकिन अमेरिकी पर्वतारोही स्कॉट फिशर की कहानी सबसे ज़्यादा दिल छू लेने वाली है। स्कॉट अपनी पर्वतारोहण कंपनी माउंटेन मैडनेस चलाते थे। वे बेहद अनुभवी, निडर और हमेशा मुस्कुराने वाले इंसान थे। एवरेस्ट अभियान से पहले उन्होंने मज़ाक में कहा था कि उनके लिए एवरेस्ट पर चढ़ना मानो “पीली ईंटों वाली सड़क पर टहलने” जितना आसान होगा। लेकिन पहाड़ ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि शिखर पर चढ़ाई शुरू होने से पहले ही उनका शरीर पूरी तरह टूट चुका था। अपने एक बीमार साथी को बचाने के लिए वे कई बार ऊपर-नीचे चढ़े, जिससे उनकी सारी ताकत खत्म हो गई। इसके साथ ही वे पेट की एक गंभीर बीमारी से भी जूझ रहे थे, लेकिन उन्होंने किसी को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। इतनी खराब हालत में भी उन्होंने हार नहीं मानी और उसी दिन दुनिया की सबसे ऊँची चोटी, माउंट एवरेस्ट, पर पहुँच गए। लेकिन एवरेस्ट पर असली चुनौती ऊपर पहुँचना नहीं, बल्कि सुरक्षित नीचे लौटना होती है।

शिखर से लौटते समय अचानक भयंकर बर्फ़ीला तूफ़ान आ गया। तेज़ हवाएँ चलने लगीं, तापमान तेजी से गिर गया और उनका ऑक्सीजन सिलेंडर भी लगभग खाली हो गया। ऑक्सीजन की कमी से उनके मस्तिष्क में सूजन आने लगी, वे भ्रमित हो गए और उनके लिए एक-एक कदम चलना भी मुश्किल हो गया। जब उन्हें लगा कि वे अपनी टीम की रफ्तार रोक रहे हैं, तो उन्होंने अपने प्रमुख शेरपा से सिर्फ इतना कहा, “मैं बहुत बीमार हूँ… तुम चले जाओ।” यही उनके आख़िरी शब्द थे। उनकी टीम ने उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की। मशहूर पर्वतारोही अनातोली बौक्रीव भी अपनी जान जोखिम में डालकर भीषण तूफ़ान में उन्हें खोजने निकले, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 11 मई 1996 को सिर्फ 40 साल की उम्र में स्कॉट फिशर ने हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

जब बचाव दल उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने एक अजीब बात देखी। इतनी भीषण ठंड के बावजूद उनकी मोटी डाउन जैकेट खुली हुई थी और कंधों से नीचे खिसकी हुई थी। डॉक्टर इसे “पैराडॉक्सिकल अंड्रेसिंग” कहते हैं। अत्यधिक ठंड में मौत से ठीक पहले कभी-कभी दिमाग़ व्यक्ति को यह महसूस कराता है कि उसे बहुत गर्मी लग रही है। इसी भ्रम में वह अपने गर्म कपड़े उतारने लगता है, जबकि उसका शरीर तेजी से जम रहा होता है। साल 2010 में अनुभवी शेरपाओं की एक टीम ने सम्मान के साथ स्कॉट फिशर के पार्थिव शरीर को मुख्य पर्वतारोहण मार्ग से हटाकर एक शांत स्थान पर पहुँचा दिया, ताकि वे हमेशा के लिए सुकून से विश्राम कर सकें। आज एवरेस्ट बेस कैंप जाने वाले रास्ते पर उनकी याद में एक पत्थर का स्मारक बना हुआ है। वहाँ से गुजरने वाला लगभग हर ट्रेकर उस बहादुर पर्वतारोही को याद करता है, जिसने आख़िरी सांस तक हार नहीं मानी।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।