Kamakhya Temple : कामाख्या पहुँची तो पता चला कि देवी रजस्वला हैं। यह बात मुझे होटल वाले ने बड़े उल्लास से बताई, जैसे कोई शुभ समाचार सुना रहा हो। और सच कहूँ तो वह शुभ ही था। अम्बुबाची का समय था। मंदिर का गर्भगृह बंद था, पर नीलाचल खुला था, पर्वत खुला था, आकाश खुला था। तांत्रिक आ रहे थे, भक्त आ रहे थे, उत्सुक लोग आ रहे थे, और मैं भी उन्हीं में शामिल थी।

पहाड़ी चढ़ते हुए मेरे कदम कई बार अटके। राजा आगे-आगे चल रहा था और मैं उसके पीछे। उसकी पीठ को देखते हुए अचानक मेरे मन में विचार आया कि पीठें कितनी झूठी होती हैं, शायद चेहरों से भी अधिक, या शायद उतनी ही। हम जिन लोगों को सबसे अधिक जानते हैं, कई बार उनकी पीठ ही हमें सबसे अधिक दिखाई देती है।
रास्ते में पहला तांत्रिक एक काले पत्थर पर बैठा मिला। उसके शरीर पर भस्म लगी थी। सफेद राख उसकी त्वचा पर ऐसी दिख रही थी जैसे किसी ने उसे मिटाने की कोशिश की हो और बीच में ही रुक गया हो। उसकी जटाओं में लाल धागे बँधे थे। उसकी आँखें विचित्र थीं ऐसी कि समझना कठिन था कि वे कुछ देख रही हैं या सब कुछ देख चुकी हैं। उसने मेरी ओर देखा। मुस्कुराया नहीं, पर उसके चेहरे पर एक क्षणिक हलचल हुई, जैसे शांत पानी में कोई कंकड़ गिर जाए और लहरें उठकर फिर शांत हो जाएँ। उसके सामने एक असली मानव-खोपड़ी रखी थी, जिस पर गहरे रंग के फूल चढ़े थे। वे फूल मुझे किसी घाव की तरह लगे।
मैं कुछ देर वहाँ रुकना चाहती थी, पर राजा ने मेरा हाथ पकड़कर आगे बढ़ा लिया। उसे हमेशा की तरह जल्दी थी।
मंदिर परिसर में बलि के लिए लाए गए बकरे और पाड़े दिखाई दिए। यह दृश्य मेरे भीतर एक अजीब बेचैनी पैदा कर रहा था। एक सफेद बकरा विशेष रूप से मेरी स्मृति में रह गया है। वह एकदम शांत था। उसे सजा-सँवारकर लाया गया था, जैसे किसी विशेष अवसर के लिए तैयार किया गया हो। वह मिमिया नहीं रहा था। उसकी चुप्पी मुझे सबसे अधिक विचलित कर रही थी। मैं सोचती रही क्या उसे पता था कि उसके साथ क्या होने वाला है? या उसे कुछ भी पता नहीं था? दोनों ही संभावनाएँ मुझे समान रूप से भयावह लगीं।
एक बड़ा-सा काला पाड़ा भी था। उसकी भूरी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे मैं उस समय शब्द नहीं दे सकी। शायद आज भी नहीं दे सकती। उसकी आँखों के बारे में मैं कभी किसी उपन्यास में लिखना चाहूँगी।
बलि के समय तांत्रिक मंत्र पढ़ रहे थे। वे मंत्र हवा में घुल नहीं रहे थे, बल्कि भीतर उतरते प्रतीत हो रहे थे पत्थरों में, वातावरण में, और मेरी हड्डियों तक में। खड्ग उठा, एक पल ठहरा और फिर गिर गया। मैंने अपनी आँखें बंद नहीं कीं। यह मेरी अपनी जिद थी। राजा ने आँखें मूँद ली थीं।
बलि के बाद पत्थरों पर खून था, भूमि पर खून था, और उन सबके नीचे दूर बहती ब्रह्मपुत्र था।
वापसी में होटल की सीढ़ियों पर एक बुज़ुर्ग मिले। उन्होंने बताया कि अम्बुबाची के दिनों में ब्रह्मपुत्र का रंग बदल जाता है। लोकविश्वास है कि देवी का रक्त मिट्टी में उतरता है और मिट्टी नदी में। उन्होंने कहा कि इन दिनों ब्रह्मपुत्र केवल ब्रह्मा का पुत्र नहीं रहता, वह देवी का हो जाता है।
मैंने नदी की ओर देखा। दूर से कोई लाल रंग दिखाई नहीं दे रहा था, पर पानी में एक अजीब-सा भारीपन था। ऐसा लगा जैसे वह अपने भीतर कोई प्राचीन कथा बहा रही हो, कोई ऐसा रहस्य जो कभी समाप्त नहीं होता।
उस शाम होटल लौटकर हम दोनों खिड़की के पास बैठे। बाहर जून की असमी उमस थी और भीतर मेज़ पर रखी वोदका। राजा को Absolut पसंद है। उस रात मुझे भी वही अच्छी लगी। पीली रोशनी में उसका चेहरा असाधारण रूप से शांत और सुंदर लग रहा था। मैं उसे देखती रही
और सोचती रही कि मैं यह बात अक्सर भूल जाती हूँ।
मैंने उससे कहा कि मैं एक उपन्यास लिखना चाहती हूँ।
उसने पूछा किस पर?
मैंने कहा कामाख्या पर। देवी पर। रक्त पर। तांत्रिकों पर। ब्रह्मपुत्र पर। उस सफेद बकरे पर। उस पाड़े की आँखों पर। राजा कुछ देर चुप रहा। फिर उसने मुझे अपनी बाँहों में लेते हुए धीरे से कहा तुम उपन्यास क्या, महाकाव्य लिख सकती हो।
उसकी बात सुनकर मैं हँस पड़ी, पर उस हँसी के साथ एक अनाम गर्माहट भी भीतर फैल गई। शायद वह केवल शराब की गर्माहट नहीं थी। शायद कामाख्या की थी। शायद इच्छा की। शायद उन दोनों की मिली-जुली कोई ऐसी अनुभूति, जिसे किसी एक शब्द में बाँधना कठिन है।
उस रात पहली बार लगा कि मेरे भीतर बरसों से बँधी कोई गाँठ ढीली हुई है। कोई संकोच, कोई झिझक, कोई अनकहा भय जैसे पीछे छूट रहा था।
राजा सो गया, पर मैं देर तक जागती रही। खिड़की के बाहर अँधेरा था और भीतर “महाकाव्य” शब्द गूँज रहा था। उसके लिए वह शायद एक प्रशंसा थी, पर मेरे लिए वह चुनौती बन गया था। मैंने उसी रात तय किया कि मैं कामाख्या पर लिखूँगी। उस तांत्रिक पर लिखूँगी। उस बकरे की चुप्पी पर लिखूँगी। उस पाड़े की आँखों पर लिखूँगी। और उस ब्रह्मपुत्र पर भी, जो मेरी कल्पना में अब भी लाल बह रही थी।
अगली सुबह गुवाहाटी हवाई अड्डे पर उड़ान देर से थी। राजा ड्यूटी फ्री की दुकानों में घूम रहा था और मैं एक बेंच पर बैठी थी। मेरे बैग में मामोनी रायसम गोस्वामी की पुस्तक छिन्नमस्ता थी। मैंने उसे निकाला और पढ़ना शुरू किया। पढ़ते हुए बार-बार लगा कि कामाख्या केवल एक मंदिर नहीं है। वह एक अनुभव है, एक चेतना है, एक स्त्री-शरीर और स्त्री-अस्तित्व की ऐसी स्वीकृति है जो कहीं और दुर्लभ है।
विमान में बैठकर मैंने नीचे फैले असम को देखा। हरियाली दूर तक फैली थी। ब्रह्मपुत्र दिखाई नहीं दे रही थी, पर मैं जानती थी कि वह वहाँ है, अपने रहस्यों और अपनी कथाओं के साथ। देवी तब भी रजस्वला थीं।
और मैं तब तक यह तय कर चुकी थी कि मैं इस यात्रा को केवल स्मृति बनाकर नहीं छोड़ूँगी। मैं इसे लिखूँगी। शायद उपन्यास में। शायद किसी और रूप में। बाकी बहुत-सी चीज़ें अनिश्चित हैं घर, शहर, दफ़्तर, भविष्य पर यह निर्णय निश्चित है।कामाख्या।
यह एक ऐसा नाम है जिसे लिखने के बाद कुछ देर चुप रहना पड़ता है।


